पूरे विश्व में जिस तरह प्लास्टिक का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है। उससे पृथ्वी पर ही नहीं, बल्कि समुद्र में भी प्लास्टिक का ढेर जमा होने लगा है। वर्ष 1950 के बाद से बढ़ती जनसंख्या का पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इंसानों ने पेड़-पौधों को तो नुकसान पहुंचाया ही है, साथ ही पर्यावरण को सबसे ज्यादा दूषित करने वाले प्लास्टिक का इस्तेमाल कर रहे हैं। बाजार में प्लास्टिक कई किस्म के हैं, लेकिन एकल इस्तेमाल प्लास्टिक का इस्तेमाल हमारे पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है। एकल इस्तेमाल का मतलब ही होता है कि उसे एक बार इस्तेमाल के बाद फेंक देना है। लोग इसे बाजार से खरीद कर लाते हैं और इस्तेमाल के बाद जहां-तहां फेंक देते हैं। यही प्लास्टिक नदियों और नालों से बहते हुए सागर और महासागर में पहुंच जाते हैं। जिससे महासागर में दूर-दूर तक प्लास्टिक का मलबा सतह पर जमा हो गया है।
कई सालों से प्रदूषण के बढ़ते स्तर को कम करने के लिए विश्व की कई प्रदूषण नियंत्रण एजंसियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। उन्हीं में से कुछ एजंसियां प्रदूषण का विस्तार कहां-कहां पर है, इसे देखने के लिए शोध कर रही हैं। कुछ ऐसे ही शोध से शोधकर्ताओं ने समुद्र में फैले प्रदूषण को देखने के लिए एक नया माडल विकसित किया है, जिसके तहत यह पता लगाया गया है कि वर्तमान में महासागर के बहुत बड़े भाग पर प्लास्टिक के कचरे का फैलाव हो गया है। ऐसा अनुमान है कि महासागरों में अभी 2,50,000 टन प्लास्टिक का ढेर तैर रहा है, जो समुद्र में रहने वाले जीवों के लिए चिंता का सबब बना हुआ है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, भूमध्य सागर जीव-जंतुओं के लिए समृद्ध स्थान है, मगर यहां भी कचरे का अंबार पसरा हुआ है। समुद्र में फैला कचरा सीधे तौर पर पर्यावरण को तो प्रभावित करता ही है, साथ ही इन जीवों के आहार के जरिए इंसान के शरीर में प्रवेश कर उसे प्रभावित करता है। इस प्रक्रिया से पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। समुद्र में रहने वाले जीवों के लिए प्लास्टिक का ढेर होना अच्छा नहीं है। अगर समुद्र की सतह पर प्लास्टिक की थैलियां जमा हो जाएंगी, तो समुद्री जीव कहां रहेंगे? प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग पर जल्द से जल्द अंकुश लगाने की जरूरत है, अन्यथा निकटतम भविष्य में जैसे पृथ्वी पर जीवों के रहने रहने के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ इसी तरह समुद्र में भी जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचने लगेगा।
’शशांक शेखर, आइएमएस, नोएडा, उप्र
तंग नजर
अक्सर महिलाओं के पहनावे को लेकर नुक्ताचीनी की जाती है। महिलाओं को क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं पहनना चाहिए, उन्हें मोबाइल का इस्तेमाल करना चाहिए या नहीं करना चाहिए या महिलाओं को ऊंची आवाज में नहीं बोलना चाहिए, इस तरह के बयान आते रहते हैं। ये बयानवीर धार्मिक संस्थाओं से जुड़े लोग भी हो सकते हैं और नेता भी। हमारे देश का संविधान हर नागरिक को यह आजादी देता है कि वह जो कुछ पहनना चाहे जो कुछ भी खाना चाहे या देश में कहीं भी आना-जाना चाहे, जा सकता है। आम घरों में भी क्या पहनना चाहिए या क्या और कैसे बोलना चाहिए इसकी सलाह केवल लड़कियों को ही दी जाती है। नैतिक मूल्यों को लेकर लड़कों को कभी भी शिक्षित नहीं किया जाता। कभी किसी लड़की के साथ कोई अनहोनी हो जाती है तो उसके लिए भी उसी को दोषी ठहराया जाता है, उसके पहनावे या मोबाइल पर दोष मढ़ दिया जाता है। लड़के तो लड़के हैं उनसे गलती हो जाती है, यह कह कर लड़कों को छोड़ दिया जाता है।
हमारा समाज भी कुछ ऐसा है, जहां फैसले पुरुष लेते हैं और महिलाओं को जिम्मेदारी सौंप दी जाती हैं। आज हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा नाम कमा रही हैं, चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या खेल हो या विज्ञान का क्षेत्र, महिलाएं हर तरफ अपना परचम लहरा रही हैं। हमें महिलाओं को कठघरे में खड़ा करने के बजाय लड़कों को नैतिक मूल्यों से अवगत कराना चाहिए, लड़कों को सुधारना चाहिए।
’चरनजीत अरोड़ा, नरेला, दिल्ली
The post प्रदूषण का सागर appeared first on Jansatta.
From: Jansatta
Read Full Post ㅡ https://ift.tt/2YLoyVN