खाद्य तेलों के बढ़ते दामों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने जो फौरी कदम उठाए हैं, वे काफी पहले उठाए जाने चाहिए थे। सरकार ने अगले साल 31 मार्च तक खाद्य तेलों की भंडारण सीमा तय कर दी है। यानी अब कोई भी व्यापारी एक निर्धारित सीमा से ज्यादा तेलों का भंडार नहीं रख सकेगा। इसके साथ ही नेशनल कमोडिटी एक्सचेंज में सरसों और तिलहन के वायदा कारोबार पर रोक लगा दी गई है। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के बाद खाद्य तेलों के दामों ने भी रिकार्ड बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जाहिर है, घरों की रसोई का बजट बुरी तरह से बिगड़ना ही था।
दरअसल, तेल एक जरूरी खाद्य पदार्थ है जिसके बिना रसोई में काम चल नहीं सकता। फिर, बाजारों में खाद्य तेलों से बनने वाले उत्पादों के दाम बढ़ने का भी बड़ा कारण खाद्य तेलों का महंगा होना रहा है। ऐसे में इन तेलों के बढ़ते दामों ने आम आदमी के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। कहने को खाद्य तेलों की महंगाई को लेकर सरकार चिंता तो पहले भी जता रही है, लेकिन कोई ऐसा कदम नहीं उठाया था जिससे लोगों को पहले ही राहत मिल पाती।
गौरतलब है कि महंगाई में खाद्य तेलों के लगातार बढ़ते दामों ने भी आग में घी का काम किया है। थोक और खुदरा महंगाई दोनों में इसका योगदान रहा। खाद्य तेलों को लेकर सरकार अब जिस तरह से चेती है, उसकाबड़ा कारण त्योहारी मौसम है। त्योहार के दिनों में खान-पान संबंधी वस्तुओं का कारोबार भी कम नहीं होता। घरों में भी खाद्य तेलों की खपत बढ़ जाती है। ऐसे में अगर खाद्य तेल और महंगे हुए तो यह बजट को और बिगाड़ देगा। खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने सभी राज्यों से कहा है कि वे अपने-अपने यहां इनके भंडारण की सीमा तय कर दें। इससे जमाखोरों पर भी शिकंजा कसा जा सकेगा। लेकिन तेल का आयात-निर्यात करने वाले कारोबारियों को इससे सशर्त रियायतें दी गई हैं। तेलों के वायदा कारोबार पर रोक लगाने का मकसद भी यही है कि आने वाले दिनों में महंगे दामों पर सौदे न हों जो घरेलू बाजार को प्रभावित करें।
खाद्य तेलों की महंगाई के पीछे बड़ा कारण विदेशी बाजारों में इनके ऊंचे दाम भी हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग साठ फीसद खाद्य तेलों का आयात करता है। ऐसे में अगर विदेशी बाजार में तेल महंगा होगा तो घरेलू बाजार में असर पड़ना तय है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक भारत में खाद्य तेलों की खपत ढाई करोड़ टन सालाना है। पर भारत में सिर्फ अस्सी लाख टन ही खाद्य तेल का उत्पादन होता है, बाकी दो-तिहाई हिस्से का आयात किया जाता है। महामारी के दौर में खाद्य तेल उत्पादक देशों में भी उत्पादन पर असर पड़ने से दाम चढ़ने का सिलसिला जारी रहा।
ऐसा नहीं कि सरकार तेल के दामों को बढ़ने से रोक नहीं सकती थी। अगर सरकार चाहती तो बिना इंतजार किए आयात शुल्कों में तर्कसंगत संशोधन कर तेल के दाम चढ़ने से रोक सकती थी। आयात शुल्कों के अलावा खाद्य तेलों पर लगने वाले वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और उपकर (सेस) भी कोई कम नहीं है। इन सबको मिला देने से तेलों का बिक्री मूल्य बढ़ना तय है। इसीलिए व्यापारी काफी समय से तेलों पर लगने वाले आयात शुल्क, जीएसटी और उपकर को घटाने की मांग भी कर रहे हैं। खाद्य तेलों का ऐसा संकट हमेशा बना रहने वाला है और इस संकट से पार तभी पाया जा सकता है कि जब खाद्य तेल उत्पादन में भारत आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े।
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From: Jansatta
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