Tuesday, October 19, 2021

घाटी में रक्तपात

हाल की घटनाओं का विश्लेषण करने से लगता है कि कश्मीर में आतंकवाद ने नया स्वरूप धारण किया है। रोज वहां हिंसा के मामले आ रहे हैं, वह भी गैर-मुसलिमों के। इससे हिंदू-मुसलिम के बीच की खाई और बढ़ रही है, जो सांप्रदायिकता को जन्म देगा। प्रश्न उठता है कि क्या फिर कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़ कर प्रवासी होकर जीवन बिताना होगा, जैसा कि नब्बे के दशक में हुआ था। कश्मीर में तो हालात सामान्य थे, तो प्रश्न उठता है कि ये घटनाएं शुरू क्यों हुर्इं। शायद इसका उत्तर है, तालिबान का सत्ता में आना।

तालिबान के सत्ता में आने से कश्मीर में उपस्थित आतंकवादियों का मनोबल बढ़ा है। सरकार को जल्द से जल्द कठोर कदम उठाना होगा और कश्मीर की वादियों को भयमुक्त बनाने के लिए प्रयास करना होगा, क्योंकि अगर ऐसा ही चलता रहा, तो इससे हमारी वैश्विक छवि खराब होगी तथा भारत में उपस्थित हिंदू समुदाय में मुसलिम समुदाय के लिए नकारात्मक भावना मजबूत होगी।
’मृत्युंजय सिंह, इलाहाबाद विवि

परिवार की पार्टी

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस अब एक परिवार की पार्टी बन कर रह गई है। पिछले तेईस वर्षों से पार्टी अध्यक्ष पद पर सोनिया गांधी या उनके पुत्र राहुल गांधी काबिज रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, तब सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया था। तभी से कांग्रेस पार्टी के अंदर एक पूर्णकालिक अध्यक्ष की मांग उठ रही थी। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में सोनिया गांधी ने अपने आप को पूर्णकालिक अध्यक्ष बता कर सभी विरोधियों को चुप रहने की नसीहत दे डाली है।

राहुल गांधी को फिर एक बार अध्यक्ष बनाने की मांग उठ रही है। अगले वर्ष अध्यक्ष पद के चुनाव की खानापूर्ति की जाएगी और राहुल गांधी की ताजपोशी सुनिश्चित है। लगता है कि कांग्रेस पार्टी सिर्फ एक परिवार की पार्टी बन कर रह गई है। यह पार्टी के भविष्य के लिए सही नहीं है। राहुल गांधी को नेतृत्व क्षमता सिद्ध करने के कई अवसर मिले, लेकिन हर अवसर पर वे विफल सिद्ध हुए हैं। सोनिया गांधी को पार्टी की खातिर पुत्र मोह त्याग कर कांग्रेस की कमान किसी योग्य नेता के हाथों में सौपनी चाहिए।
’हिमांशु शेखर, केसपा, गया

दहशत पर सवाल

निर्दोष लोगों की हत्या पर नेशनल कान्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने कहा है कि हत्याओं की घटनाओं में कश्मीरियों का हाथ नहीं है। यह उनको बदनाम करने की साजिश है। शांत माहौल को खराब करने की कोशिश है। सवाल है कि अगर गैर-मुसलिम और गैर-कश्मीरियों की हत्याओं में कश्मीरियों का हाथ नहीं है, तो क्यों नहीं कश्मीरी खुद उन्हें संरक्षण देने के लिए आगे आ और इन हत्याओं की निंदा कर रहे हैं। 1990 में कश्मीरी पंडितों की नृशंस हत्या और उनके पलायन के समय भी अगर स्थानीय लोगों ने साथ दिया होता, तो आज इस भाईचारे और गंगा-जमुनी तहजीब पर आंच नहीं आती।
’प्रदीप उपाध्याय, मेंढकी रोड, देवास

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From: Jansatta

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