प्रकृति में मनुष्य ही एक ऐसा विवेकशील प्राणी है, जो अपनी बौद्धिक क्षमता से वृहद स्तर पर व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर सकता है। अगर वह चाहे तो समस्त प्राणियों के साथ परस्पर सहयोग आधारित संतुलन स्थापित कर सकता है। आधुनिक सभ्यता में मानव औद्योगीकरण और वैज्ञानिक आविष्कारों के सहारे जितना तीव्र गति से विकास कर रहा है, उतना ही वह दिन-प्रतिदिन नैतिक और सामाजिक मूल्यों के स्तर पर गिर रहा है, जिससे भ्रष्टाचार, असहिष्णुता, हिंसा, व्यभिचार जैसी दुष्वृत्तियों का विकास तीव्रता से हो रहा है। फिर चाहे वह कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा गैर-मुसलिमों की हत्याएं हो, बलात्कार हो, लखीमपुर खीरी की घटना हो या निहंग सिखों द्वारा युवक की बर्बरतापूर्ण हत्या की घटना हो, इन सबने संपूर्ण मानवता को शर्मसार किया है। यहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक हैं कि आखिर हम इतने अमानवीय और असंवेदनशील कैसे हो रहे हैं?
हमें यह ध्यान रखना होगा कि किसी भी सभ्य समाज की निशानी उसके मानवीय मूल्य होते हैं। जब तक हम एक आवाज में इन अमानवीय कृत्यों का विरोध नहीं करेंगे, तब तक ये क्रूरताएं चलती रहेंगी। हमें स्थायी शांति के समाधान ढूंढ़ने होंगे। मनुष्य सदाचारी और परस्पर विकासोन्मुख हो, इसके लिए समाज और सरकारों को संस्कारपूर्ण और रोजगारपरक आधुनिक शिक्षा की व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर उचित समानता तथा न्याय की स्थापना के प्रयास करने चाहिए।
’दिनेश चौधरी, सिरोही (राजस्थान)
सवाल से पहले
देश में जांच एजेंसियां स्वतंत्र रूप से काम करती हैं, मगर थोड़ा-बहुत नियंत्रण सरकार का तो होता ही है, जिसको लेकर वाद-विवाद होता है। ऐसा लोकतंत्र में परंपरागत रूप से होता आया है। अक्सर विपक्ष इस पर एतराज उठाता है। हाल ही में एनसीपी नेता शरद पवार ने जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए हैं।
देश में सीबीआई, ईडी, एनसीबी जैसी जांच एजेंसियां हैं, जो अपने-अपने कार्य क्षेत्र में कार्य करने को स्वतंत्र हैं। देखने में आया है कि जब भी कोई बड़ी घटना होती है, विपक्ष निश्चित रूप से एजेंसियों की कार्य प्रणाली पर उंगली उठाता है, जो एकदम उचित नहीं है। अगर किसी मामले में एजेंसी की भूमिका संदिग्ध लगती है, तो विपक्ष को बोलने का हक है, मगर महज राजनीतिक लाभ के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाना ठीक नहीं है। माना कि जांच एजेंसियों को सरकार की भी सुननी पड़ती है, मगर ऐसा कांग्रेस के ही जमाने से होता आया है। ऐसे में विरोध का कोई विशेष औचित्य नहीं रह जाता है।
राकांपा नेता शरद पवार के आरोपों में भले राजनीति झलकती हो, मगर इससे एजेंसियों की जांच प्रणाली भी संदेह के घेरे में आती है। अच्छा यही हो कि राजनेता इन एजेंसियों पर उंगली उठाने से पूर्व विचार मंथन कर लें। इससे संबंधित जांच तो प्रभावित नहीं होगी।
’अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, मप्र
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