Tuesday, July 12, 2022

पनबिजली परियोजना अब और नहीं, किन्नौरियों ने किया लहजा सख्त

ओमप्रकाश ठाकुर

हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक आपदाओें के लिहाज से बेहद संवेदनशील कबाइली जिले किन्नौर में स्वैच्छिक संगठनों ने अरबों रुपयों की नई प्रस्तावित पनबिजली परियोजनाओं के निर्माण को लेकर अपने आंदोलन को विस्तार देना शुरू कर दिया है। यहां के लोगों ने पहले ही ‘नो मीन्स नो’ आंदोलन छेड़ रखा है। यह आंदोलन अब जिला किन्नौर तक ही समिति नहीं रहा है बल्कि लाहौल स्पीति तक भी पहुंच गया है।

यह आंदोलन सोशल मीडिया के जरिए भी खूब फल फूल रहा है। किन्नौर के इन संगठनों ने बीते दिनों पंजाब में मत्तेवाड़ा जंगल को बचाने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन को समर्थन देने का एलान भी किया था जबकि मत्तेवाड़ा जंगल में औद्योगिक परियोजना को आज रद्द कर दिया गया है। याद रहे बीते दिनों पनबिजली परियोजनाओं से हो रही तबाही व विरोध के बावजूद लगाई जा रही परियोजनाओं का विरोध करते हुए जिला किन्नौर की कई पंचायतों ने चुनावों का बहिष्कार किया था। अब दोबारा से इन गांवों के लोगों ने आगामी विधानसभा चुनावों का बहिष्कार करने का एलान कर दिया है।

बीते दिनों विश्व बैंक के सहयोग से प्रदेश के ऊर्जा निदेशालय ने जन परामर्श में भाग लेने के लिए कबाइली इलाकों के लोगों को राजधानी में बुलाया था। जिला किन्नौर के स्वैच्छिक संगठनों ने विश्व बैंक की टीम को साफ कर दिया है कि वे इस तरह के जन परामर्श को एक ढोंग से ज्यादा कुछ नहीं मानते। जिला किन्नौर के पर्यावरण को पूरी तरह से तहस नहस कर दिया गया है। यहां के लोगों के लिए पूजनीय नदी सतलुज को पनबिजली परियोजनाओं के लिए बनाई गई सुरंगों में कैद कर दिया गया है। यहां बसे गांवों के नीचे सुरंगें बना दी गर्इं और यहां पर पानी के स्रोत सूख गए हैं।

हिमलोक जागृति मंच किन्नौर की ओर से जिया लाल नेगी, परमेश्वर नेगी और भगत सिंह ने कहा कि जन परामर्श के नाम पर यह फर्जीवाड़ा किया जा रहा है। प्रदेश में अकेले जिला किन्नौर में खड़ी की गई पन बिजली परियोजनाओं से 3200 मेगावाट के करीब बिजली पैदा हो रही है व जिला किन्नौर में 100 मेगावाट से भी कम की खपत है बाकी तमाम बिजली बाहर जा रही है।

लेकिन इन परियोजनाओें ने यहां के लोगों के जिंदगी, जमीन, जल और जंगलों को खतरे में डाल दिया है। प्रदेश के कबाइली इलाकों में एक अरसे से पनबिजली परियोजनाओं को लेकर विरोध की आवाज उठ रही है लेकिन अब ‘किन्नौर बिकने के लिए नहीं’ जैसे नारे भी मुखर होने लगे है व समर्थन भी बढ़ने लगा है। याद रहे पिछले साल निगुलसेरी में 28 लोगों की जगह-जगह भूस्खलन की चपेट में आने से मौत हो गई थी। इनमें सैलानी भी शामिल थे। यहां के लोगों का कहना है कि जिस इलाके में यह घटना हुई वह विश्व बैंक समर्थित नाथपा झाकड़ी परियोजना का प्रभावित इलाका है।

जिया लाल नेगी कहते हैं कि कबाइली इलाकों की आबादी पहले से ही हरित ऊर्जा के नाम पर अत्यधिक नुकसानों को झेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि पूरे किन्नौर ने अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग कर हरित ऊर्जा के नाम पर बन रही जल विद्युत परियोजनाओं को नकार दिया है। लेकिन फिर भी राज्य सरकार अनदेखी कर के परियोजनाओं को लगाने में जोर दे रही है। हाल ही में ऊर्जा निदेशालय ने 26 जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के लिए निविदा जारी किए इसमें से सात परियोजनाएं जिला किन्नौर में ही प्रस्तावित हैं।

याद रहे कि निजी कंपनियां व सरकारें पनबिजली परियोजनाओं को हरित ऊर्जा के नाम से लोक लुभावन बताकर पहाड़ों के नदी नालों में पैठ बना रही हैं। लेकिन इन स्वैच्छिक संगठनों का कहना है कि यह हरित ऊर्जा का नारा सरासर धोखा है। कबाइली जिलों के लोग चाहे बरसात हो या सर्दी का मौसम प्राकृतिक आपदाओं को लेकर हर दम सहमे रहते हैं, लेकिन अब वे पर्यावरण से हो रहे खिलवाड़ का उनके जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने लगे हैं।



From: Jansatta

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