Wednesday, February 16, 2022

UP Election: कानपुर 10 सीटों पर पिछली बार बीजेपी ने किया था सूपड़ा साफ, पढ़ें इस बार क्‍या हैं समीकरण

उत्तर प्रदेश का दिल और प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में से एक कानपुर ने 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए भारी मतदान किया था। यहां तक ​​कि नोटबंदी के झटके को भी पीछे छोड़ दिया था। कानपुर के महत्व को स्वीकार करते हुए, भाजपा ने अपने सात में से दो विधायकों को (जो कानपुर की 10 सीटों से जीते थे) कैबिनेट मंत्री बनाया था। 20 फरवरी को होने वाले चुनाव में अपने प्रदर्शन को दोहराने की उम्मीद में भाजपा विकास की बात कर रही है और चाहती है कि बेरोजगारी का गुस्सा उन पर भारी न पड़े।

1991 से कानपुर के विधायक और प्रदेश सरकार में औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना जो अपना आठवां विधानसभा चुनाव जीतने की कोशिश कर रहे हैं, वो जिले भर में पार्टी के स्टार प्रचारक हैं। नुक्कड़ बैठकों में, वह मेट्रो रेल के हाल ही में उद्घाटन किए गए पहले चरण (जिसके लिए समाजवादी पार्टी भी श्रेय लेती है) और 24 घंटे बिजली आपूर्ति के बारे में बात करते हैं। कानपुर कैंट में प्रचार के दौरान सतीश महाना ने कहा कि, “2017 से पहले जब हमारी सरकार नहीं थी तो बत्ती नहीं आती थी, हमारी सरकार बनी तो बत्ती जाती नही है। सब को उसका लाभ मिला है।”

समाजवादी पार्टी के लोग भारतीय जनता पार्टी के बारे में कहते हैं कि ये लोग एक विशेष जाति और धर्म का पक्ष लेते हैं। क्षेत्र लगातार उस एनकाउंटर की बात करता है जिसमें विकास दुबे के साथ 7 अन्य लोगों को मारा गया था और किस तरह से उनके परिवारों के साथ दुर्व्यवहार किया गया था। योगी आदित्यनाथ सरकार पर हमेशा ये आरोप लगता है कि ये सरकार ठाकुरों की है और ये प्रभावी ब्राह्मणों को दबाना चाहते हैं।

मौके को भुनाने के लिए कांग्रेस ने विकास दुबे के करीबी अमर दुबे (जो 2020 में एनकाउंटर के दौरान मारा गया था) की साली नेहा तिवारी (खुशी दुबे की बहन) को कल्याणपुर विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया है। कानपुर एक समय कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था लेकिन अब यहां पर लड़ाई बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच है।

सीसामऊ से सपा प्रत्याशी इरफ़ान सोलंकी ने कहा कि, ”नोटबंदी के दौरान जनता को बेवकूफ़ बनाया गया लेकिन इस बार नहीं। कोविड ने रोजगार छीन लिया है, किसान यह नहीं भूले हैं कि भाजपा ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया। जनता ने यह भी देखा है कि भाजपा कैसे हिंदू और मुसलमानों के बीच विभाजन पैदा करना चाहती है, बिजली के बिलों में वृद्धि, उन्हें (बीजेपी) इसका जवाब देना होगा।”

बुधवार को अपने रोड शो में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी नोटबंदी और कानपुर के छोटे व्यापारियों और चमड़ा उद्योग पर इसके प्रभाव के बारे में बात की।

भाजपा द्वारा अर्थव्यवस्था को नष्ट करने के आरोपों से इनकार करते हुए सतीश महाना ने कहा, “सपा एक भी बड़ा उद्योग कानपुर नहीं ला सकी। लेकिन मुझे खुशी है कि मैं जाति आधारित राजनीति से इतर औद्योगीकरण और रोजगार पर चर्चा को ले जाने में सक्षम हूं। हम लेदर क्लस्टर्स को विकसित कर रहे हैं।”

महत्वपूर्ण सीटों का वर्तमान परिदृश्य

महाराजपुर: 2009 में परिसीमन के बाद बनी यह सीट 2012 और 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सतीश महाना ने जीती थी। इससे पहले महाना ने कानपुर छावनी सीट से विधायक थे। वह इस बार सपा के 36 वर्षीय युवा उम्मीदवार सिख फतेह बहादुर के खिलाफ हैं, जिन्होंने पिछले साल महाना के घर के बाहर बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए राज्य का ध्यान खींचा था और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। बहादुर बार-बार पिछले पांच वर्षों में कम होती नौकरियों और औद्योगीकरण की बात करते हैं।

बिल्हौर (आरक्षित): यह विधानसभा क्षेत्र ओबीसी और दलित मतदाता बाहुल्य है। 2017 में बीजेपी के भगवती प्रसाद सागर ने जीत दर्ज की थी। हालांकि समाजवादी पार्टी यहां पर एक मजबूत ताकत के रूप में मौजूद रही है और 2012 में विधानसभा से जीत हासिल की थी। अब समाजवादी पार्टी यहां पर और मजबूत हुई है क्योंकि भगवती सागर को अपने पाले में कर लिया है। इस बार यहां पर बीजेपी उम्मीदवार बीजेपी के कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र के अध्यक्ष राहुल बच्चा सोनकर हैं।

कल्याणपुर: यह सीट ओबीसी बाहुल्य है और बीजेपी की मजबूत सीट रही है। यहां से बीजेपी नेता प्रेमलता कटियार 2012 तक 4 बार चुनाव जीत चुकी थी, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के सतीश निगम ने उनको हरा दिया। 2017 में प्रेमलता कटियार की बेटी नीलिमा कटियार ने वापस बीजेपी के लिए यहां से जीत हासिल की। इस बार सतीश निगम और नीलिमा कटियार एक दूसरे के खिलाफ मैदान में हैं। जबकि कांग्रेस ने एनकाउंटर में मारे गए गैंगस्टर विकास दुबे की साली नेहा तिवारी को उम्मीदवार बनाया है। नेहा कहती हैं कि पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों का समर्थन उनके साथ है। वहीं बीजेपी उनके आरोपों का जवाब दूबे गैंग द्वारा पुलिस वालों की हत्या के बारे में बता कर दे रही है।

सीसामऊ: सीसामऊ मुस्लिम बाहुल्य सीट है और 2017 में समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की थी। कानपुर जिले की आर्यनगर के अलावा यही एक सीट थी से समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की थी। सपा के उम्मीदवार इरफान सोलंकी हैं जो इसके पहले आर्य नगर से विधायक थे और 2012 और 2017 में सीसामऊ से चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी। बीजेपी ने यहां पर आर्यनगर से पूर्व विधायक सलिल विश्नोई को उम्मीदवार बनाया है।

कानपुर कैंट: यह इकलौती सीट है जो कांग्रेस ने 2017 में कानपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में जीती थी। कांग्रेस ने इस बार भी अपने जीते हुए नेता सोहेल अंसारी को मैदान में उतारा है। हालांकि कांग्रेस के 2017 में जीते हुए 7 विधायकों में चार ने पार्टी छोड़ दी। 3 विधायकों में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय लल्लू, सोहेल अंसारी और आराधना मिश्रा कांग्रेस में मौजूद है। बीजेपी ने रघुनंदन सिंह भदौरिया को उम्मीदवार बनाया है जो 2012 में इस विधानसभा क्षेत्र से विजई हुए थे।

2017 में किसको कितना प्रतिशत वोट मिला था: 2017 में कानपुर की 10 सीटों में बीजेपी को बिल्हौर में 42% वोट, बिठूर में 49% वोट, कल्याणपुर में 48% वोट, गोविंद नगर में 60% वोट, किदवई नगर में 54% वोट, महाराजपुर में 56% वोट, घाटमपुर में 49% वोट हासिल हुआ था। वहीं सपा को सीसामऊ में 47% वोट और आर्यनगर में 48% वोट मिला था। जबकि कानपुर कैंट सीट पर कांग्रेस को 46% वोट मिला था।

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From: Jansatta

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