Wednesday, February 16, 2022

महंगे तेल से बढ़ता संकट

परमजीत सिंह वोहरा

हैरानी की बात तो यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम कम होते हैं तब भी देश में पेट्रोल-डीजल महंगे बिकते हैं। जाहिर है, इसके पीछे सरकार की कर नीतियां बड़ा कारण हैं। इन दिनों इस बात की सुगबुगाहट फिर से जोर पकड़ने लगी है कि आने वाले दिनों में भारत के घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम फिर से बढ़ सकते हैं। इसका मुख्य कारण रूस और यूक्रेन के बीच बने युद्ध के हालात हैं।

इस वैश्विक संकट के कारण पिछले कुछ दिनों से कच्चे तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। सितंबर 2014 के बाद से पहली बार कच्चा तेल नब्बे डालर प्रति बैरल से ऊपर निकल गया है। तेरह फरवरी को यह 93.10 डालर था। जनवरी में यह अठासी डालर और दिसंबर में पचहत्तर डालर के आसपास था। पिछले दो महीने में ही इसके दामों में करीब पच्चीस पच्चीस फीसद की बढ़ोतरी हो गई।

कच्चे तेल के वैश्विक दामों में बढ़ोतरी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए हमेशा से एक आर्थिक संकट के रूप में सामने आती रही है। कारण बड़ा ही स्पष्ट है कि भारत अपनी कच्चे तेल की क्षमता का लगभग छियासी फीसद आयात करता है। भारत की कच्चे तेल की उत्पादन क्षमता दस से पंद्रह फीसद ही है। कच्चे तेल की जरूरत अर्थव्यवस्था से लेकर रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी है।

घरों में इस्तेमाल होने वाले हर सामान के निर्माण से लेकर आपूर्ति तक के काम में र्इंधन का इस्तेमाल होता है। यातायात के संसाधन भी इसी से संचालित होते हैं। एक किसान खेती करने के लिए ट्रैक्टर और सिंचाई के लिए पंपसेटों का उपयोग करता है, उसमें भी डीजल की खपत होती है। औद्योगिकीकरण की मुख्य आवश्यकता भी कच्चा तेल ही है। भारत प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ अरब बैरल कच्चे तेल का आयात करता है।

दिसंबर 2021 में करीब दो करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया गया था, जो नवंबर 2021 के मुकाबले सात फीसद अधिक था। भारत ओपेक समूह के जिन देशों से तेल खरीदता है, उनमें सऊदी अरब और इराक प्रमुख हैं। आने वाले समय में तो यह और बढ़ेगा क्योंकि भारत एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और आगामी वित्त वर्ष के लिए पेश किए गए वित्तीय बजट में विकास की दर के लिए आर्थिक नीतियों का जोर ढांचागत विकास पर ही है। सरकार ने इसके लिए अपने पूंजीगत खर्च को बढ़ाया है। ऐसे में कच्चे तेल के मूल्यों की बढ़ोतरी से अगर निपटना है तो भारत को स्वयं कच्चे तेल के उत्पादन की अपनी क्षमता बढ़ाने पर जोर देना होगा।

वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल के दामों में बढ़ोतरी आयात बिल को बढ़ाती है और इसका सीधा असर महंगाई के रूप में सामने आता है। कच्चे तेल के दामों में वृद्धि अर्थव्यवस्था में बहुआयामी दुष्प्रभाव डालती है। इसकी शुरुआत तुलनात्मक रूप से डालर के मुकाबले रुपए के कमजोर होने से होती है और इससे आयात की लागत बढ़ जाती है। चूंकि इसका पूर्वानुमान नहीं होता है, इसलिए यह अर्थव्यवस्था के चालू खाते के घाटे को भी बढ़ा देती है।

अंतत: वित्तीय घाटे का पूर्वानुमान भी इससे प्रभावित होता है। इन सबके नकारात्मक नतीजे भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ता है। इससे तेल कंपनियों के मुनाफे पर भी असर पड़ता है। इन सब का सामना करने के लिए सरकार के पास एक ही उपाय है कि पेट्रोल, डीजल व रसोई गैस के घरेलू मूल्यों में वृद्धि करे। इसके लिए केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क को सहारा बनाती है तो राज्य सरकारें मूल्य वर्धित कर (वैट) को। और यहीं से आम आदमी पर इसका असर पड़ना शुरू हो जाता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद भारत सबसे अधिक कच्चे तेल का आयात करने वाला मुल्क है। यह दर्जा थोड़ा अचंभित करता है क्योंकि भारत में विनिर्माण क्षेत्र तो अमेरिका के जैसा न तो सशक्त है और न ही भारत की प्रति व्यक्ति आय अमेरिका की प्रति व्यक्ति के आसपास है। परंतु इसे आर्थिक रूप से भुगतना आम आदमी को ही पड़ता है। भारत हर साल करीब डेढ़ अरब बैरल कच्चा तेल आयात करता है। एक बैरल की क्षमता एक सौ इनसठ लीटर होती है। कच्चे तेल का भुगतान अमेरिकी डालर में किया जाता है।

इसलिए सबसे पहले डालर का रुपए के मुकाबले वैश्विक मूल्य ही इसका आधार बनता है। अगर रुपया मजबूत है तो कच्चा तेल सस्ता पड़ेगा और अगर रुपया कमजोर है तो कच्चे तेल के आयात की लागत बढ़ जाती है, चाहे कच्चे तेल के वैश्विक दाम कम ही क्यों ना हों। उदाहरण के तौर पर अगर डालर का मूल्य सत्तर के आसपास लिया जाए तो एक सौ उनसठ लीटर प्रति बैरल की लागत भारतीय मुद्रा में इकतालीस रुपए प्रति लीटर होगी।

यह आरंभिक लागत होती है। इसके बाद कई अन्य तरह के कर और लागत भी इसमें जुड़ती जाती हैं, जिनमें तेल शोधन, भाड़ा, डीलर का मुनाफा आदि मिल कर ही घरेलू बाजार में लागत तय करते हैं। इसके बाद केंद्र सरकार द्वारा लिए जाने वाला उत्पाद शुल्क और राज्य सरकारों द्वारा लिए जाने वाला मूल्य वर्धित कर (वैट) का अंतिम जुड़ाव घरेलू बाजार में खुदरा मूल्य को तय करता है।

अब चूंकि वैश्विक बाजारों में कच्चा तेल महंगा हो रहा है, तो जाहिर-सी बात है कि इसका प्रत्यक्ष नुकसान अर्थव्यवस्था को होगा। इसके लिए सरकारों को अपने स्तर पर जो सबसे आसान और एकमात्र उपाय नजर आता है वह घरेलू बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाना है। पर यह इस समस्या का एकतरफा हल है। इससे सीधे तौर पर महंगाई बढ़ती है। करों के बोझ से परिवहन लागत बढ़ती है। खाद्य पदार्थोें से लेकर हर चीज की ढुलाई की लागत भी बढ़ जाती है। और इसका सीधा बोझ आम आदमी की जेब पर पड़ता है।

करों की दरों के बारे में बात की जाए तो पिछले कुछ वर्षों में केंद्रीय उत्पाद शुल्क में भारी इजाफा हुआ है। पांच-छह वर्ष पूर्व पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क जहां 9.48 रुपए प्रति लीटर था, वही पिछले वर्ष तक यह पैंतीस रुपए के आस पास चला गया। डीजल पर तो पेट्रोल की तुलना में और अधिक बढ़ोतरी हुई है। कुछ महीने पहले तक भारत के घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम एक सौ दस रुपए के ऊपर निकल गए थे। हालांकि त्योहारी मौसम में करों की दरों में मामूली कमी की गई थी, पर इसका ज्यादा असर नहीं पड़ा। इससे जो महंगाई बढ़ी, वह अभी तक कम नहीं पड़ी है। दिसंबर में घरेलू बाजार में महंगाई दर पांच फीसद से ऊपर रही। इसमें पेट्रोल, डीजल व रसोई गैस के मूल्यों का बहुत बड़ा कारण रहा है।

भारतीय अर्थव्यवस्था अपने आकार को लगातार बढ़ा रही है। हाल में कई वैश्विक आर्थिक संस्थानों की रिपोर्टों भविष्यवाणी भी की है कि आगामी कुछ वर्षों में भारत नौ फीसद से अधिक की विकास दर हासिल करने वाले देशों में होगा। कच्चे तेल की जरूरत तो लगातार बढ़ेगी। इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार को अपनी रणनीति बदलनी होगी और आयात करने वाले देशोंं से अल्पकालीन समझौते करने पर जोर देना होगा। दरअसल आर्थिक नीतियां ऐसी बनाई जानी चाहिए जिससे वैश्विक बाजारों में तेल मूल्यों में बढ़ोतरी का असर आम आदमी पर न पड़े।

हैरानी की बात तो यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम कम होते हैं तब भी देश में पेट्रोल-डीजल महंगे बिकते हैं। जाहिर है इसके पीछे सरकार की कर नीतियां बड़ा कारण हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि घरेलू बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों को बेचने और इस पर लगने वाले करों को तार्किक बनाने पर जोर दिया जाए।

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From: Jansatta

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