रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की ताजा भारत यात्रा से दोनों देशों के पुराने रिश्तों को और मजबूती मिली है। पुतिन के साथ वहां के रक्षामंत्री और विदेशमंत्री भी आए और अपने भारतीय समकक्षियों से मुलाकात की। इस मुलाकात में रक्षा, व्यापार, ऊर्जा आदि क्षेत्रों में सहयोग को लेकर कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।
हालांकि भारत पहले ही रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली खरीद और एके-203 राइफल बनाने के लिए लाइसेंस प्राप्त कर चुका है, पर पुतिन की इस यात्रा में आगे के वर्षों को ध्यान में रखते हुए भी रणनीति तय की गई, जो कि बहुत महत्त्वपूर्ण है। हालांकि रूस के साथ भारत के ये रक्षा सौदे नए नहीं हैं, बहुत पहले से वह उससे रक्षा उपकरण खरीदता आ रहा है।
हालांकि बीच के कुछ वर्षों में अमेरिका, फ्रांस और इजराइल से भी कुछ रक्षा सौदे होने की वजह से रूस से उपकरणों की खरीद कम हो गई थी, पर अब मिसाइल प्रणाली खरीदने और अत्याधुनिक राइफल भारत में ही बनाने का लाइसेंस मिल जाने के बाद फिर से दोनों देशों के बीच रक्षा सौदों के मामले में बेहतर रिश्ते बन गए हैं। हालांकि अमेरिका शुरू से दबाव बनाता आ रहा था कि भारत मिसाइल प्रणाली रूस से न खरीदे, मगर भारत ने उसका दबाव नहीं माना। वह मिसाइल प्रणाली जल्दी भारत पहुंचतने वाली है।
रक्षा सौदों के अलावा ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में भारत की जरूरतों के लिहाज से भी रूस के साथ प्रगाढ़ हो रहे रिश्ते बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। चीन और अमेरिका पर भारत की निर्भरता बढ़ना भरोसेमंद नहीं हो सकती। रूस और भारत बहुत पुराने मित्र हैं और हर गाढ़े वक्त में रूस भारत के काम आया है, जैसा कि पुतिन के साथ मुलाकात के वक्त प्रधानमंत्री ने उल्लेख भी किया कि किस तरह कोविड के समय रूस ने हमारी मदद की। चीन और अमेरिका विस्तारवादी नीतियों पर चलने वाले देश हैं। इसलिए उन्हें रूस के साथ भारत की दोस्ती सदा खटकती रही है।
स्वाभाविक ही पुतिन की इस यात्रा पर इन दोनों देशों की नजर लगी हुई थी। इसकी वजह केवल रक्षा सौदे नहीं, कूटनीतिक पहलू भी है। हालांकि चीन और रूस के संबंध बेहतर हैं, फिर भी कई मामलों में दोनों के बीच तनातनी बनी रहती है। जैसे यूरेशिया में दोनों एक-दूसरे की पैठ नहीं बनने देना चाहते। फिर चीन के साथ सीमा पर भारत के जो तनावपूर्ण रिश्ते रहते हैं, उससे भी वह रूस की भारत की नजदीकी नहीं देखना चाहता।
पिछले कुछ सालों में अमेरिका के साथ भारत के संबंध प्रगाढ़ हुए हैं, कई मामलों में अमेरिका ने भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था पर भरोसा भी जताया है, मगर रूस के साथ उसके तनावपूर्ण रिश्ते ही रहे हैं, इसलिए वह नहीं चाहता कि भारत उस पर से निर्भरता छोड़ कर रूस के साथ संबंध बनाए रखे। वह चाहता है कि व्यापार, ऊर्जा और सामरिक मामलों में भारत उसी पर निर्भर रहे। मगर भारत ने उसका यह दबाव न मान कर एक तरह से बड़ा कूटनीतिक दांव खेला है।
रूस से रिश्ते मजबूत करने की जरूरत इसलिए भी थी कि अफगानिस्तान में उसे अपनी उपस्थिति बनाए रखनी है। फिर चीन की विस्तारवादी नीतियों को भी इससे चुनौती मिलेगी, क्योंकि वह भी अफगानिस्तान में अपनी पैठ बनाए हुए है। रूस के साथ यह दोस्ती संयुक्त राष्ट्र में भी भारत की स्थिति मजबूत करेगी। न सिर्फ भारत के लिए, बल्कि रूस के लिए भी पुतिन की यह यात्रा लाभदायक साबित होगी।
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From: Jansatta
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