Tuesday, December 7, 2021

दिखावे की दावत

योगेंद्र माथुर

देश में कोरोना की घटती रफ्तार और सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों में शिथिलता से जनजीवन अब सामान्य होता नजर आने लगा है। स्वाभाविक ही शादी-ब्याह के कार्यक्रमों की रौनक भी अब लौट आई है। अब उनमें पहले की तरह भीड़भाड़ होने लगी है। पिछले दिनों देवउठनी एकादशी के बाद जब शादी-ब्याह का सिलसिला शुरू हुआ, तो मुझे भी एक के बाद एक कई शादियों में शामिल होने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

शादी-ब्याह की इस धूमधाम में जाहिर है, हमेशा की तरह ही ऐश्वर्य और विलासिता के भरपूर दर्शन हुए। ‘तेरी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे?’ की तर्ज पर दिखने वाली होड़ में आयोजक अपनी क्षमता से अधिक पैसा खर्च करते नजर आए। परिणय स्थल मसलन, गार्डन, धर्मशाला, लाज-होटल की चमक बढ़ाने की गरज से टेंट और विद्युत साज-सज्जा पर पैसा पानी की तरह बहता दिखाई दिया।

समारोह पंडाल की साज-सज्जा तो ठीक, भोजन को भी अपनी सामर्थ्य के प्रदर्शन का माध्यम बना लिया गया हो, ऐसा लगा। भोजन में कुछ नया या नई किस्में परोसने की होड़ में निर्मित व्यंजनों का आंकड़ा छप्पन भोग के भी पार जाता नजर आया। सभी व्यंजनों के नाम तो शायद आयोजक को भी मालूम नहीं होंगे। अब भले खाने वाला चार-पांच व्यंजनों से अधिक का स्वाद न ले पाए, न चख पाए या फिर प्लेट में छोड़ता नजर आए, आयोजक की आर्थिक संपन्नता का प्रदर्शन तो हो ही गया।

कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसे शादी समारोहों में धन के साथ अन्न का भी अपव्यय होना तय है। आप सोचिए, क्या कोई मेहमान चाह कर भी भोजन के अपव्यय को रोक पाएगा? समझदारी दिखा कर वह इतने अधिक पकवानों में से कुछ का स्वाद न भी चखे या प्रत्येक पकवान का एक या आधा टुकड़ा ले, तो भी कुछ मात्रा में ही सही, भोजन का अपव्यय निश्चित है। हालांकि सभी मेहमानों से इतनी समझदारी की उम्मीद करना भी बेमानी ही होगा।

हमारे देश में जब से ‘बुफे’ संस्कृति का विस्तार हुआ है, भोजन का अपव्यय भी बढ़ा है। इसमें बुफे संस्कृति की बुराई जैसी कोई बात नहीं है। कमी हममें ही है, क्योंकि इसके सही तौर-तरीकों के पालन के संस्कार हमारे यहां नहीं पनप पाए हैं। प्राय: शादी समारोहों में यही देखने में आता है कि लोग प्लेट में खाना लेते समय, बाद में मिलेगा या बचेगा कि नहीं के सोच के चलते अपनी प्लेट में एक साथ अधिकाधिक खाद्य सामग्री रख तो लेते हैं, पर बाद में अधिकांश लोग ‘जूठन’ के रूप में छोड़ देते हैं। ऐसी स्थिति में छप्पन या अधिक पकवान बन जाएं तो भोजन की बर्बादी को कौन रोक सकता है?

हमारी संस्कृति में अन्न के एक-एक दाने का महत्त्व बताया गया है। अन्न को ब्रह्म कहा गया है, उसे देवतुल्य माना गया है। ऐसी स्थिति में शादी समारोहों में भोजन का ‘जूठन’ के रूप में फेंका जाना क्या अन्न का तिरस्कार या देवता का अपमान नहीं है? जिस देश में लाखों बच्चे भुखमरी और कुपोषण का शिकार बन कर असमय दम तोड़ देते हों, उस देश में अन्न को अपनी संपन्नता के प्रदर्शन का माध्यम बनाना कहां तक उचित है?

वैवाहिक आयोजनों के माध्यम से दूसरों की अपेक्षा अपने को कहीं अधिक बड़ा, समर्थ, सक्षम और संपन्न बताने की यह अंधी होड़ निश्चित ही बेहद खतरनाक है। उधार का घी पीकर अपनी संपन्नता दर्शाने की प्रवृत्ति तो निश्चित ही व्यक्ति, परिवार और समाज को पतन की ओर ले जाने वाली है। वर्तमान चार दिन की चकाचौंध भविष्य को गहरे अंधकार में धकेलने वाली है।

हम चीजों की नकल करने में माहिर हैं। उस नकल में अकल का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करते। भोजों या दावतों में दिखावा इसी का नतीजा है। अगर नकल करनी ही है, तो उन देशों की करनी चाहिए, जहां भोजों में व्यंजनों की बर्बादी को लेकर सख्त कानून बने हुए हैं। कई देशों में भोजन की बर्बादी पर भारी जुर्माने का प्रावधान है।

कई देशों में यहां तक तय है कि भोज में अधिकतम कितने व्यंजन परोसे जा सकते हैं। उससे अधिक व्यंजन वहां कोई नहीं बना सकता। यों चार-पांच तरह के खाद्य पर्याप्त होते हैं। कुछ मिठाइयों वगैरह को जोड़ लें, तो यह संख्या बढ़ सकती है। पहले जब लोगों को जमीन पर बिठा कर खिलाने और परोसने की परंपरा थी, तब इतनी भोजन की बर्बादी नहीं होती थी। मगर हमने उस परंपरा को छोड़ दिया है।

अन्न बर्बादी की इस होड़ से हमें समाज को बचाना होगा और यह हम तभी कर पाएंगे या समाज को कोई संदेश दे पाएंगे, जब हम अपने से ही इसकी शुरुआत करेंगे। बेहतर होगा कि हम अपने घर-परिवार में होने वाले वैवाहिक आयोजन सादगीपूर्ण गरिमा के साथ आयोजित करें और विवाह समारोह की चकाचौंध पर होने वाले खर्च से ‘परिणय-सूत्र’ में आबद्ध हो रहे जोड़े के भविष्य को रोशन करें।

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From: Jansatta

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