दूसरों की आलोचना या निंदा करना हम सभी के स्वभाव में होता है। दोस्तों की महफिल हो या फिर रिश्तेदारों का मिलन हो, सभी जगह हमें दूसरों की निंदा करने में असीम सुख मिलता है। कई बार तो ऐसा होता है कि हम निंदा भी कर देते हैं और साथ ही यह भी प्रदर्शित कर देते हैं कि हमें दूसरों से क्या मतलब है। यानी यह संकेत दे देते हैं कि हम निंदा नहीं कर रहे हैं। लेकिन यह चालाकी पकड़ ली जाती है।
निंदा बिल्कुल खुजली की तरह होती है। बार-बार निंदा करने में सुख मिलता है। हालांकि जिस तरह बार-बार खुजाने से मर्ज बढ़ता जाता है उसी तरह बार-बार निंदा करने की प्रवृत्ति से स्थिति खराब होती जाती है। प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने तो निंदा के महत्व को देखते हुए ‘निंदा रस’ शीर्षक से एक व्यंग्य ही लिख दिया था। उनका कहना था कि निंदा कुछ लोगों के लिए टॉनिक होती है। निश्चित रूप से कुछ लोगों का जीवन तो निंदा रस के बहाने ही चलता है।
दरअसल कभी भी सभी लोगों की दृष्टि और विचार एक नहीं हो सकते। एक परिवार में भी सभी सदस्यों के विचार अलग-अलग होते हैं। हम किसी भी प्रसंग को अपने नजरिए से देखते हैं। जरूरी नहीं कि हमारा नजरिया दूसरे व्यक्ति से मेल खाता हो। इसलिए किसी भी कार्यक्रम या प्रसंग को हम अपने नजरिए से देखते हुए उसमें कमी निकालना शुरू कर देते हैं। हम अच्छे से अच्छे कार्यक्रम में भी कमी निकाल देते हैं, बिना इस बात पर विचार किए हुए कि इसमें कितना परिश्रम लगा है।
बेहतर तो यह होगा कि हम अपनी दृष्टि और विचारों को स्वयं तक ही सीमित रखे। कोई अच्छा कार्यक्रम या प्रसंग हो जाने के बाद उसकी निंदा करना या उसमें कमी निकालना तर्कसंगत नहीं है। अगर हमारी नीयत साफ है तो हम कार्यक्रम से पहले उसे और बेहतर बनाने के लिए अपनी सलाह जरूर दे सकते हैं। कार्यक्रम सम्पन्न हो जाने के बाद उसकी निंदा करना या फिर उसमें कमी निकालने का अर्थ है कि हमारी नीयत साफ नहीं है। हर इंसान अपने हिसाब से कोई भी कार्यक्रम करता है। इसके पीछे उसकी अपनी दृष्टि होती है। जाहिर है कि हर इंसान अपनी दृष्टि से दुनिया को देखता है न कि आपकी दृष्टि से। इसलिए किसी भी इंसान की नेक दृष्टि पर सवाल उठाना जायज नहीं है।
जब हमारे अंदर निंदा करने की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है तो हमारा संयम समाप्त हो जाता है और हम पग-पग पर निंदा करने के लिए आतुर रहते हैं। निंदा करने के लिए यह उतावलापन अंतत: हमें ही निदंनीय बना देता है। निंदा करने वाले तो निंदा करने का मौका खोजते ही रहते है लेकिन दूसरों की निंदा सुनना हमें भी अच्छा लगता है। हमें भी दूसरों की निंदा सुनने में मजा आता है। किसी बैठक या मंडली में जहां भी निंदा हो रही हो, अनायास ही हमारा ध्यान वहां चला जाता है।
अगर हम उस जगह से थोड़ी दूरी पर हैं तो कान लगाकर निंदा सुनने लगते हैं और कुछ क्षणों बाद उसी जगह पर पहुंच जाते हैं। हम उस इनसान की निंदा भी रोचकता के साथ सुन लेते हैं, जिस इनसान के बारे में हमें यह पता होता है वह सज्जन है और निंदा के लायक नहीं है। बल्कि एक कदम आगे बढ़कर निंदा करने वाले व्यक्ति की हां में हां मिलाकर हम भी निंदा में कुछ बातें कह डालते हैं। इस तरह देखा जाए तो यह समस्त समाज ही एक-दूसरे की आधारहीन निंदा में लिप्त है। यह आधारहीन निंदा हमारे आपसी विश्वास को कम कर रही है।
इसी कारण कई बार एक अच्छे और सज्जन व्यक्ति के बारे में भी गलत बातें प्रचारित हो जाती हैं। हम इन गलत बातों की अपने स्तर से छानबीन करना भी जरूरी नहीं समझते हैं और इन बातों को आगे बढ़ा देते हैं। इस तरह निंदा रस के कारण एक सज्जन व्यक्ति को भी दुर्जन सिद्ध कर दिया जाता है। यही कारण है कि समाज में ऐसी अनेक सुनी-सुनाई बातें प्रचारित-प्रसारित होती रहती हैं, जिनका कोई आधार नहीं होता है लेकिन समाज इन्हीं बातों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। दूसरों की निंदा करना यह भी दर्शाता है कि हमारे अंदर ईर्ष्या की भावना विद्यमान है। इसलिए निंदा की प्रवृत्ति त्यागकर ही हम कुंठा रहित समाज बना सकते हैं।
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From: Jansatta
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