वृंदावन में मथुरा-वृंदावन रोड पर रामकृष्ण मिशन अस्पताल से ठीक पहले दाईं ओर अंदर जाने वाली एक सड़क पर तराश वाला मंदिर मौजूद है। बाहर से देखने पर यह मंदिर कोई धर्मशाला जैसा लगता है लेकिन अंदर जाने पर अति सुन्दर मंदिर है। तराश वाला मंदिर की स्थापना राजर्षि श्री वनमाली रायबहादुर ने कराई थी।
इस मंदिर में बहुत ही सुन्दर रंगीले बोलते जागृत श्री विग्रह हैं जिन्हें जवांई ठाकुर कहा जाता है। इस मंदिर की स्थापना के पीछे जो कहानी है उसके अनुसार, तरास एस्टेट में नवग्राम के एक अधिकारी वांछाराम निकट ही मौजूद नदी में नियम से नित्य स्नान करते थे। एक दिन स्नान करते समय उन्हें एक मधुर आवाज सुनाई पड़ी, जो कह रही थी, मुझे जल से निकालकर अपने घर ले चलो। वांछाराम ने चकित होकर चारों ओर देखा लेकिन कुछ दिखा नहीं। तभी कोई वस्तु जल में उनके पांव से टकराई। हाथ डालकर जब देखा तो यह एक अद्भुत श्रीविग्रह था।
उन्होंने उसे हृदय से लगाया और अपने घर ले आए। विग्रह की नित्य सेवा करने लगे। भगवान रोज स्वप्न में आदेश देकर उनसे कभी नई पोशाक, तो कभी नए आभूषण, इत्र-फुलेल, नए मिष्ठान, पकवान आदि मांगने लगे। वांछाराम उनकी इच्छाओं को श्रद्धानुसार पूर्ण करते और दूसरे लोगों से मांगकर भी ठाकुर जी की सेवा पूजा करते रहते और उन्हें मनाने का प्रयास करते। एक दिन एक व्यक्ति को उस क्षेत्र के प्रसिद्ध रायबहादुर श्रीवनमाली जी के पास भेजा गया।
उसने राय साहब से यह सारी घटना बताई तथा कहा कि एक भक्त के यहां जाग्रत प्रभावी लीलाधारी श्रीठाकुर जी पधारे हैं। जब राय बहादुर ने यह सब सुना तो उनसे रहा नहीं गया और वह पत्नी और 10 वर्षीय बेटी राजकुमारी राधा को साथ लेकर ठाकुरजी के दर्शन करने के लिए पहुंचे। जब सभी दर्शन कर रहे थे, तभी राजकुमारी से ठाकुरजी के नैन मिले तो राजकुमारी राधा अपनी मां से बोली कि ठाकुरजी उन्हें देखकर हंस रहे हैं।
राधा की मां ने बात को आया-गया कर कहा कि ऐसा भी कभी होता है क्या? सभी अपने घर आ गए, परन्तु राजकुमारी राधा को बार-बार ठाकुरजी का हंसना और उसकी तरफ यों टकटकी लगाकर देखना भूला नहीं जा रहा था। वह बार-बार ठाकुरजी के दर्शन करने के लिए जाने लगी और उसने अपने पिता से कहा कि विग्रह को अपने साथ घर ले जाएं।
राय बहादुर ने भक्तराज वांछाराम से यह बात कही। उसी रात, भगवान ने स्वप्न में वांछाराम से कहा कि अब हम राय साहब के घर जाना चाहते हैं। इसके बाद गाजे-बाजे के साथ राधा के घर के लिए श्रीविनोद ठाकुर जी को ले जाया गया। राजकुमारी तो राजकुमारी थी उसे ठाकुरजी कैसा पौशाक पहनेंगे, कैसा उनका शृंगार होगा, क्या भोग लगाया जाएगा, सब व्यवस्था वह स्वयं ही करतीं।
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