Monday, December 6, 2021

समान शिक्षा

संसद की एक स्थाई समिति ने पूरे भारत में एक समान पाठ्यक्रम लागू करने का सुझाव दिया है। यह मुद्दा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि अभी हाल में आई नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के शुरुआती प्रयास किए जा रहे हैं। इसके चलते पाठ्यक्रम में उलट-फेर स्वाभाविक है। इसलिए इस मुद्दे पर बात करने का यह सटीक समय है।

बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है बेहतर रणनीति, जिसमें शिक्षा की अहम भूमिका होती है; जिसकी दिशा पाठ्यक्रम से तय होती है। अमेरिका से इसके महत्त्व को समझा जा सकता है, जो भारत की तरह ही ब्रिटेन का उपनिवेश रहा था। उसके शुरुआती विकास माडल में अन्य रणनीतियों के साथ आवश्यकतानुरूप स्कूली शिक्षा की प्राथमिकता, जिसके चलते विकसित तकनीकी के साथ कुशल श्रमिकों ने उसकी अन्य औद्योगिक राष्ट्रों से प्रतिस्पर्धा को आसान कर दिया। यानी शिक्षा में बड़ी लकीर खींच कर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बढ़त ली जा सकती है। बशर्ते पाठ्यक्रम की दशा और दिशा उचित हो।

इस प्रकार शिक्षा सुधार के क्रम में समान पाठ्यक्रम पर ध्यान केंद्रित करना महत्त्व का विषय हो जाता है, जिससे अखिल भारतीय स्तर पर शिक्षा की उपयोगिता सुनिश्चित हो और पाठ्यक्रम को और अधिक प्रासंगिक बनाया जा सके। संवैधानिक दृष्टि से देखें तो अनुच्छेद 16 अवसर की समानता की बात करता है। यह तभी संभव है जब अवसर प्राप्ति के माध्यमों में समानता हो; जिसका एक माध्यम पाठ्यक्रम भी है।

वर्तमान में प्रशासन, तकनीकी, चिकित्सा, सेना भर्ती आदि अनेक परीक्षाओं का अखिल भारतीय स्तर पर आयोजन किया जाता है। इसके लिए बेहद जरूरी है कि सभी राज्य या क्षेत्र के लोगों की आनुपातिक भागीदारी हो, ताकि क्षेत्रीय संतुलन बना रहे, जोकि एक स्वस्थ संघीय व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है। यह तभी संभव है, जब सभी को समान शिक्षा दी जाए।

ध्यान देने योग्य है कि आजादी से कुछ वर्ष पूर्व पूंजीपतियों के एक समूह द्वारा आर्थिक विकास के लिए बांबे प्लान लाया गया था, जिसमें अन्य सुझावों के साथ उचित स्कूली शिक्षा को बढ़ावा देने की बात कही गई थी। मगर इसके विपरीत नेहरू माडल में उच्च शिक्षा पर अधिक बल दिया गया। लक्ष्य के अनुसार प्रतिभा भी विकसित हुई, लेकिन उनकी प्रतिभा का पर्याप्त दोहन भारत में नहीं हो सका तथा प्रतिभा बाहर विश्व में पलायन करती रही। इसकी मुख्य वजह रही भारत की परिस्थितियां और पाठ्यक्रम में तारतम्यता की कमी।

लंबे समय तक स्कूली शिक्षा राज्यों की नैतिकता के सहारे चलती रही। 2002 में संविधान संशोधन कर शिक्षा को अधिकारों के अंतर्गत लाया गया। पुरानी शिक्षा नीति वर्तमान में उतनी प्रासंगिक नहीं रही; तो पिछले वर्ष ही नई शिक्षा नीति लागू की गई, जिसके लक्ष्य आधुनिक हैं। शिक्षा साध्य है और पाठ्यक्रम साधन, इसलिए लक्ष्य प्राप्ति के लिए जरूरी है कि पाठ्यक्रम भी आधुनिक हो।

इसलिए सीबीएससी, आइसीएससी और राज्य के अपने शिक्षा बोर्डों में विभाजित स्कूली शिक्षा को एक समान पाठ्यक्रम विकसित करने के सुझाव को गंभीरता से लेने आवश्यकता है। भले उसका भाषाई माध्यम कुछ भी हो।
’मोहम्मद जुबैर, कानपुर

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From: Jansatta

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