सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी
यह कैसी व्यस्तता है कि किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है। इस भोगवादी और भौतिक संस्कृति ने बहुत नजदीकी और संवेदनशील संबंधों को भी मोबाइल के इस युग में इतना यथार्थवादी बना दिया है कि वे घर में भी एक-दूसरे को मुश्किल से समय दे पाते हैं। यह भी मुमकिन है कि वे एक-दूसरे से मोबाइल पर ही बात करते हों।
हम जब भी अपने करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलते हैं, तो यही गिला करते हैं कि जीवन की आपाधापी में संपर्क करने का समय ही नहीं मिल पाता। मानते भी हैं कि अधिकतर समय फोन पर या टीवी देखने में चला जाता है। हम अपने बच्चों को भी समय नहीं दे पाते, क्योंकि हमारी तरह उनकी भी अपनी दुनिया और समय चक्र है। आप समय का अभाव कहें, व्यस्तता या फुर्सत न मिलने की शिकायत करें, सार यही है कि जिंदगी मशीनी हो गई है और बतियाने का समय नहीं मिल पाता। यहां तक कि अखबार पढ़ने के लिए भी समय नहीं मिल पाता। खबरें मोबाइल पर मिल जाती हैं।
समय के साथ चीजें, आदतें बदलती हैं और शौक भी बदलते हैं। कभी आपसी बातचीत का अपना सुख होता था। लोग घंटों चबूतरों पर बैठ कर बतरस का आनंद लेते थे। अब वह बात नहीं रही। लोग धीरे-धीरे गल्प विधा को भी भूलते जा रहे हैं। अस्सी के दशक तक लोग कविता, शायरी, संगीत और नाटकों का घंटों लुत्फ उठाते थे। धीरे-धीरे कुछ तो इनका चलन कम हुआ और कुछ श्रोता और दर्शकों की घटती संख्या भी इन आयोजनों की कमी का कारण रही। अब तो लोगों के पास इन गतिविधियों के लिए समय ही नहीं है।
कारण वही है कि उनके पास फुर्सत ही कहां है! मनोरंजन के अन्य साधन जुट गए हैं, पुराने शौक कम हो गए हैं। अब न कला संस्कृति के लिए समय है, न मिलने-जुलने के लिए और न ही अपने लिए समय है। कठपुतली का नाच, रामायण का मंचन, स्तरीय वाद-विवाद और परिसंवाद अतीत की बातें हो गई हैं। जन भागीदारी का अभाव इसकी प्रमुख वजह है। प्रोत्साहन के अभाव और प्रचार-प्रसार की कमी के कारण इन विधाओं को नई पीढ़ी भूलती जा रही है।
न तो हमारे पास अपनी विरासत को संभालने का समय है और न ही विरासत को नई पीढ़ी के हाथ सौंपने का। नतीजतन अस्सी-नब्बे के दशक तक तो यह गनीमत थी कि लोग कुंदनलाल सहगल और बाबा सहगल का नाम जानते थे। आज के लोग उन्हें नहीं जानते। वे न तो बेगम अख्तर को जानते हैं और न ही मेहदी हसन, तलत महमूद और मास्टर मदन को। यह केवल आज की समस्या नहीं है। अस्सी के दशक में राजसिंह डूंगरपुर के साथ उनकी कार में उनका साक्षात्कार लेने के लिए पूना जा रहे एक खेल पत्रकार ने जब कार में लता मंगेशकर का गाना सुन कर पूछा कि यह किसकी आवाज है, तो राजसिंह ने गुस्से में तुरंत अपने ड्राइवर से कार रोकने और उस पत्रकार को नीचे उतरने की हिदायत दी।
बरसों से अपने बाबा-दादी से नहीं मिले, छात्रावास में रह रहे बच्चे घर आने पर अगर पूछें कि ये दो बुजुर्ग कौन हैं, तो भला उनका क्या कसूर है? हमें कभी उन्हें मिलाने के लिए समय ही नहीं मिला। पाश्चात्य संगीत में रमने वाले अगर लता, रफी, मुकेश, भीमसेन जोशी और पंडित जसराज का नाम न जानें और न ही उनका संगीत समझें, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
हम वर्तमान में रहें, पर यह न भूलें कि अतीत ने ही हमें इस मुकाम पर पहुंचाया है। समय के अभाव के बावजूद हमें समस्त व्यस्तताओं में से कुछ समय निकालना होगा। यह तालमेल ही हमें सुरक्षित और जागरूक बनाए रखेगा। नया रिकार्ड बनाने का यह मतलब नहीं है कि पुराने रिकार्ड को मिटा दिया जाए। उसका उल्लेख तो होगा ही, भले ही वह संदर्भ के लिए हो।
कवि को कविता लिखने का, गायक को गाने और चित्रकार को चित्र बनाने का समय न मिले तो यह स्थिति बड़ी त्रासद होगी। जो विधा हमारे जीवन से घुल-मिल गई है और जीवन का अंग बन चुकी है, उसके बिना जीवन की कल्पना ही कैसे की जा सकती है। ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो बरसों से एक-दूसरे से मिलने का समय नहीं निकाल पाए और ऐसे लोगों को एक-दूसरे के लिए समय न निकाल पाने की शिकायत है। पर मिलने की पहल कोई नहीं करता।
मिलने पर भी न मिल पाने का शिकवा। बातचीत नहीं। क्या हमारे पास कहने-सुनने को कुछ है ही नहीं? एक शेर याद आता है जिसमें इसी स्थिति की बात की गई है- ‘तुम्हें गैरों से कब फुर्सत, हम अपने ग्राम से कब खाली/ चलो बस हो गया मिलना, न तुम खाली न हम खाली।’ अच्छा यही होगा कि हम सचेत और सजग रहें, मिलते-जुलते और बतियाते रहें।
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