सियासी सयानापन
ओवैसी की पार्टी एमआइएम से तालमेल करने से अखिलेश यादव ने यों ही इनकार नहीं किया है। इसके पीछे उनका सियासी सयानापन साफ झलकता है। पिछले दो चुनावों की हार से अखिलेश यादव ने सबक लिया है। पहले 2017 का विधानसभा चुनाव खुद सत्ता में होते हुए भी कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा। कांग्रेस की तो बुरी गत हुई ही, वह अखिलेश को भी ले डूबी। रही, 2019 के लोकसभा चुनाव की बात तो बसपा से पुराने गिले शिकवे इस सोच के साथ मिटाए थे कि भाजपा विरोधी मतों का बंटवारा नहीं होगा।
इस प्रयोग से 1993 में उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने राम लहर की हवा निकालते हुए भाजपा को सत्ता में आने से रोक दिया था। पर बुआ से हाथ मिलाने का भी भतीजे को नफा नहीं, नुकसान ही हुआ। अलबत्ता बुआ जरूर शून्य से दस के आंकड़े तक पहुंच गई। इस चुनाव में भाजपा ध्रुवीकरण करने में सफल रही। पिछले दो साल में अखिलेश ने एक तो मुसलिम तुष्टीकरण से परहेज किया, दूसरे कांग्रेस और बसपा जैसे बड़े दलों से गठबंधन नहीं करने की नई रणनीति अपनाई। मुसलिम परस्त नहीं दिखना चाहते इसलिए तो ओवैसी से गुफ्तगू तक को तैयार नहीं।
ऊपर से मुसलमानों में ओवैसी की भाजपा के हाथ का खिलौना होने की छवि बनाने का दांव अलग चल दिया। छोटे दलों को एक तो समझौते में सीटें ज्यादा नहीं देनी पड़ती। ऊपर से हरेक का किसी न किसी जाति में आधार है। केवल मुसलमान और यादव वोट के गणित से तो उनका काम बनेगा नहीं। जयंत चौधरी के रालोद, केशव देव मौर्य के महान दल, ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा व जनवादी पार्टी तो उनके साथ हैं ही अब कृष्णा पटेल की अपना दल (कमेरावादी), राजा भैया की जनसत्ता पार्टी व अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी अखिलेश के साथ गठबंधन के लिए कदम बढ़ा चुकी हैं।
केजरीवाल की पार्टी देश के सबसे बड़े सूबे में पांव जमाने की कोशिश तो 2014 से ही कर रही ह,ै पर अपने बूते कामयाबी पाने लायक हैसियत नहीं इस पार्टी की। सपा के सहारे ही सही, कम से कम खाता तो खुले। रही अखिलेश की बात तो वे जान गए हैं कि चुनाव में सदैव अंकगणित ही असर नहीं दिखाता, कैमिस्ट्री भी जादू कर जाती है। यानी बहुकोणीय मुकाबले में जीत का मंत्र दिख रहा है उन्हे।
हवाई उड़ान
प्रदेश में उपचुनावों में भाजपा को मिली हार के बाद मंथन का दौर चला हुआ है। राजधानी में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सौदान सिंह भी पहुंचे और उनके सामने भी हार के कारणों को लेकर गुबार निकला। कुछ नेताओं ने सरकार, संगठन और संघ को कठघरे में खड़ा किया तो सरकार व संगठन की ओर से भितरघातियों को पार्टी से बाहर करने का रास्ता सुझाया गया। बहरहाल तीन दिनों तक चली इन बैठकों में खूब हंगामा हुआ। लेकिन पार्टी ने बाहर एकजुट हो कहा कि 2022 में प्रदेश में भाजपा ‘मिशन रिपीट’ करेगी।
मुख्यमंत्री जयराम से लेकर प्रदेश प्रभारी अविनाश राय खन्ना से लेकर पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सौदान सिंह की जुबान पर दो ही शब्द है। वह है ‘मिशन रिपीट’। अब इस ‘मिशन रिपीट’ को लेकर भाजपा के नेता ही मजाक उड़ाने लगे हैं। इन नेताओं का कहना है कि उपचुनावों में भाजपाई चारों सीटें हार गए। मुख्यमंंत्री का गृह जिला मंडी होने के बावजूद मंडी संसदीय सीट हार गए। अब ‘मिशन रिपीट’ दोहराना शुरू कर दिया। पार्टी के तमाम दिग्गज तो इन चुनावों में अपना दमखम दिखा चुके हैं। ऐसे में ‘मिशन रिपीट’ किसके दम पर किया जाएगा।
इन नेताओं का कहना है कि 2022 में ‘मिशन रिपीट’ तो होगा लेकिन यह उपचुनावें का होगा। जो उपचुनावों में भाजपा के साथ जनता ने किया है कहीं 2022 में भी भाजपा के साथ दोबारा ऐसा न कर दे। ऐसे में जो मिशन रिपीट की बातें कर रहे हैं उन्हें हार की असल वजहों पर गौर करना चाहिए ताकि सम्मानजनक सीटें तो मिले। अब ‘मिशन रिपीट’ के उड़नखटोले में उड़ रही प्रदेश भाजपा जमीन पर उतर पाती है या हवाई उड़ान में ही गुम हो जाती है देखना होगा।
दोस्ती की तस्वीर
आजकल उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत और भाजपा के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की युगल फोटो चर्चा में है। दोनों आत्मीयता के साथ एक कार्यक्रम में मिल रहे हैं। इस तस्वीर पर कयासों का दौर जारी है। त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री थे तब वे हरीश रावत को खासी तवज्जो देते थे। दोनों ने सत्ता में रहते हुए एक-दूसरे के काम बेहिचक किए। कहा जाता है कि हरीश रावत 2017 के विधानसभा चुनाव में डोईवाला से विधायकी का चुनाव लड़ रहे थे तो त्रिवेंद्र सिंह रावत की भी मदद की थी। जिससे दोनों के रिश्ते और मजबूत हुए।
कैबिनेट मंत्री और कांग्रेसी गोत्र के नेता सतपाल महाराज के खिलाफ उनके भाई भोले जी महाराज को त्रिवेंद्र सिंह रावत से मिलाने वाले हरीश रावत ही हैं। हरीश रावत और त्रिवेंद्र सिंह रावत दोनों ने मुख्यमंत्री रहते हुए भोले महाराज को बहुत अधिक प्राथमिकता दी जिससे सतपाल महाराज हरीश रावत और त्रिवेंद्र सिंह रावत से बुरी तरह चिढ़े रहे और दोनों का विरोध करते रहे। माना जा रहा है कि इस बार विधानसभा चुनाव में त्रिवेंद्र सिंह रावत हरीश रावत की उसी तरह मदद कर सकते हैं जिस तरह 2017 के विधानसभा चुनाव में हरीश रावत ने त्रिवेंद्र सिंह रावत की मदद की थी। इसलिए दोनों की जोड़ी आजकल उत्तराखंड में चर्चाओं में बनी हुई है।
(संकलन : मृणाल वल्लरी)
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