Saturday, October 23, 2021

अशांत घाटी

इस महीने कश्मीर घाटी में जो हिंसा का नया दौर शुरू हुआ है, उसने तीस साल पुरानी यादें ताजा कर दी। याद आया मुझे कि किस तरह पाकिस्तान की सोची-समझी रणनीति के तहत घाटी से पंडितों को भगा दिया गया था। मैंने उस दौर को करीब से देखा, इसलिए कि मैं कश्मीर पर किताब लिख रही थी, जो 1995 में छपी थी। सो 1990 की जनवरी में मैं श्रीनगर में थी, जब चुन-चुन के पंडितों को मारा जा रहा था और मस्जिदों से खुत्बे आ रहे थे अजीब किस्म के, जिनका संदेश एक ही था कि घाटी में सिर्फ मुसलमानों को रहने का हक है।

याद है मुझे कि 19 जनवरी, 1990 की रात जब कोई तीन लाख पंडितों ने घाटी से पलायन किया था, मैं श्रीनगर की एक मस्जिद के सामने कुछ मुसलिम नौजवानों से बात कर रही थी, कि उनमें से एक दो ने मुझे धमकाते हुए सिर ढंकने को कहा। मैंने जब उनको याद दिलाया कि मैं मुसलिम नहीं, सिख हूं और मेरे लिए ऐसा करना लाजमी नहीं है, तो वे नौजवान इतना भड़क गए कि मेरे साथ जो कश्मीरी फोटोग्राफर थे, उन्होंने वहां से जल्दी निकल चलने की सलाह दी। इस किस्म की यादें ताजा हुई हैं इस महीने, जब अनजान जिहादी आतंकवादियों ने ग्यारह बेगुनाह लोगों को मारा, जिनमें ज्यादातर हिंदू और सिख थे।

इनमें एक दवाखाना चलाने वाला पंडित दुकानदार था, जिसने उस समय भी भागने का प्रयास नहीं किया जब बाकी कश्मीरी पंडितों ने भागने का फैसला किया था। मरने वालों में गरीब गोलगप्पा और मूंगफली बेचने वाले भी थे, जो बिहार में अपने घर छोड़ कर श्रीनगर आए थे, इस शहर की पटरियों पर अपनी दुकानें लगाने। मरने वालों में दो स्कूल के अध्यापक थे। महिला सिख थी और पुरुष हिंदू। जिहादियों ने इन लोगों को ऐसे मारा, जैसे शिकार कर रहे थे गैर-कश्मीरी लोगों का।

इन हत्याओं के बाद कश्मीर पुलिस से खबर तो मिली है कि हत्यारों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारा गया है, लेकिन क्या ऐसा वास्तव में उन्होंने किया है? उनकी बातों पर यकीन करना मुश्किल इसलिए है कि अभी तक हमने एक भी हत्यारे का चेहरा नहीं देखा है। बहुत जरूरी है इनके चेहरे देखना, क्योंकि बहुत जरूरी है मालूम करना कि हत्यारे कश्मीरी थे या पाकिस्तानी।

सीमा पर पिछले सप्ताह हमारे नौ बहादुर जवान शहीद हुए हैं पाकिस्तानी सैनिकों के साथ लड़ते हुए। अक्सर जब सीमाओं पर इस तरह की मुठभेड़ होती है, तो इशारा मिलता है कि पाकिस्तान फिर से जिहादी आतंकवादी इस पार भेजने का काम कर रहा है। इस बार हमारी मुश्किलें बढ़ गई हैं, क्योंकि अफगानिस्तान में फिर से बन गई है तालिबान की सरकार, जो भारत से दोस्ती कभी नहीं कर सकेगी, बावजूद इसके कि भारत सरकार ने अब आतंकवादियों की इस सरकार को मान्यता दे दी है, यह कहते हुए कि यथार्थ को पहचानना ही पड़ेगा।

जिस दिन मान्यता दी हमने मास्को में, उस दिन काबुल में तालिबान सरकार ने ऐलान किया कि जो नौजवान आत्मघाती हमलों के लिए राजी होंगे, उनके परिवारों को इनाम और नौकरियां देने का काम तालिबान शासक करेंगे। यानी हमको तैयार हो जाना चाहिए कि आत्मघाती हमले कश्मीर घाटी में भी होंगे और शायद भारत के अन्य राज्यों में भी। याद कीजिए कि जिस दिन तालिबान की सरकार बनी थी, काबुल में उसी दिन इमरान खान के एक मंत्री ने खुशी से कहा था कि अब तालिबान की मदद से कश्मीर हासिल करेगा पाकिस्तान। ऐसा कभी होने वाला नहीं है, लेकिन इस कोशिश में कई बेगुनाह लोग शहीद हो जाएंगे, यह भी हम जानते हैं।

मैं उनमें से हूं, जिन्होंने अनुच्छेद 370 के समाप्त होने का स्वागत किया था। मेरी नजर में यह अनुच्छेद कश्मीर घाटी और भारत के बीच एक दीवार बन गया था, जिसको गिराना जरूरी था, लेकिन मुझे उम्मीद यह भी थी कि जब घाटी की सुरक्षा भारत सरकार के हाथों में आ जाएगी, तो जिहादी आतंकवाद समाप्त हो जाएगा। सवाल यह है कि ऐसा हुआ क्यों नहीं है अभी तक? क्या नाकामी भारत सरकार की जांच संस्थाओं की है या कश्मीर के उपराज्यपाल के शासन की? नाकामियां जहां भी हों, उनको दुरुस्त करना अनिवार्य हो गया है। वरना हिंसा का यह नया दौर रुकेगा नहीं, तूल पकड़ता जाएगा और देखते ही देखते कश्मीर घाटी में एक बार फिर जिहादी आतंकवादियों का राज आएगा।

अंत में दो सुझाव देना चाहती हूं विनम्रता से। पहला यह कि कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस मिलना चाहिए, जो अनुच्छेद 370 को रद्द करते समय मोदी सरकार ने छीन लिया था, इस आधार पर कि जिहादी हिंसा रोकने के लिए ऐसा करना जरूरी था। दूसरा सुझाव मेरा यह है कि जितनी जल्दी हो सके घाटी में राजनीतिक प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए।

घाटी के तमाम राजनेताओं को नजरबंद रखा था मोदी सरकार ने यह कहते हुए कि जिहादियों को रोकने में ये लोग बाधा थे। इनकी गिरफ्तारी के बाद भारत सरकार ने बहुत कोशिश की है राजनेताओं की एक नई पीढ़ी तैयार करने की, लेकिन यह कोशिश नाकाम रही है पूरी तरह। इस हद तक कि प्रधानमंत्री को कश्मीर के उन पुराने राजनेताओं को दिल्ली बुला कर उनकी सहायता मांगनी पड़ी थी, कुछ महीने पहले।

कश्मीर में अगर हिंसा रोकने में जरा भी कामयाबी मिली होती मोदी सरकार को, तो इतना तो कम से कम हो गया होता कि कुछ कश्मीरी पंडित अपने घर वापस जा सकते। पर अब नौबत यह है कि जो मुट्ठी भर हिंदू और सिख घाटी में अभी तक रह रहे थे, उनको भगाने का प्रयास शुरू हो गया है। घाटी में हिंसा इसी तरह बढ़ती गई तो अनुच्छेद 370 का रद्द होना बेकार साबित होगा।

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From: Jansatta

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