एक से एक चढ़े हुए, चिढ़े हुए, खिसियाए हुए और फिचकुर डालते हुए चेहरे एक-दूसरे को काटते, डांटते, बोलते हैं कि कहीं दूसरा श्रेय न ले जाए!
बहसते-बहसते किसी के दांत निकल आते हैं, किसी के होठों के किनारे फिचकुर निकल आता है! कोई हाथ फेंक-फेंक कर गरजता-बरसता रहता है और कोई कुर्सी से उछलता पटा बनैती दिखाने लगता है।
अगर कोई-कोई एंकर कहता है कि एक-दूसरे को न टोकें, तो वो एंकर को ही लतियाने लगता है कि तू बिका हुआ है या बिकी हुई है और कोई-कोई नकचढ़े बीच बहस से उठ कर जाने की धमकी देने लगते हैं और एंकर रिरियाते रहते हैं कि सर जी! अभी न जाओ छोड़ कर अभी ये दिल भरा नहीं!
कुछ एंकर ऐसे भी हैं, जो अपनी मनचीती न होने पर अपनी चिड़चिड़ाहट और खिसियाहट नहीं छिपा पाते। ऐसा ही एक एंकर उस शाम दिखा, जब कोविड का टीका बनाने वाले ने ‘सौ करोड़ टीके’ लगने का लक्ष्य पूरा करने के लिए देश के ‘नेतृत्व’ की तारीफ की! जैसे ही एंकर ने तारीफ सुनी, त्यों ही एंकर का चेहरा बुझ गया!
सौ करोड़ टीके लगने के दिन की बहसों में भी एक ओर खुशी और दूसरी ओर खिसियाहट बरसती रही : हाय! हमारे होते ये हो कैसे गया? इतने टीके कैसे लग गए? सारा आंकड़ा फर्जी है! झूठ है! बकवास है! ढकोसला है! एक विपक्षी प्रवक्ता ने यहां तक कहा कि सरकार को इसका श्रेय देना उनका अपमान होगा, जिनने आफतें झेलीं! दूसरा बोला कि ये सब डाक्टरों ने किया! सरकार ने क्या किया?
लेकिन एक विपक्षी नेता ने बड़ा दिल दिखाते हुए अवश्य कहा कि भइए, जिसने किया उसको श्रेय दिया जाना चाहिए! ‘टीका-कहानी’ इतनी जबर्दस्त थी कि उसने आगरे के उस दलित की हिरासती मौत की कहानी को किनारे कर दिया और प्रियंका के हमदर्दी अभियान को किनारे कर दिया!
आर्यन खान की कहानी के बाद अनन्या पांडे की कहानी शुरू हुई और इसके साथ ही एक बार फिर हर चैनल पर वैसे ही ‘स्टाक शाट’ नाचने लगे, जैसे कभी रिया चक्रवर्ती के नाचते थे : अनन्या आ रही है! अनन्या जा रही है! अनन्या पोज दे रही है! अनन्या जिम में कसरत कर रही है! अनन्या नाच रही है! वो चंकी जी हैं, जो प्रेस से कुछ नहीं कह रहे हैं और वो देखो शाहरुख का बेटे से मिलने आना और एक औरत को हाथ जोड़ नमन करना और प्रेस से कुछ न कहना! इस कठिन घड़ी में भी कैसी विनम्रता!
आर्यन से अनन्या की नशे के बारे में हुई ‘चैटों’ को लेकर जब नारकोटिक्स वालों ने नशे की ‘ड्रग’ का सेवन करने की बाबत पूछा, तो अनन्या ने फरमाया कि वह तो मजाक कर रही थी और वह तो जानती ही नहीं कि ‘ड्रग’ क्या होती है! लेकिन आर्यन खान के बड़े भाग कि कई चैनलों की बहसों में आर्यन के बचाव में एक से एक बड़े वकील आ जुटे और देर तक एक से एक दलीलें देते रहे कि ‘जमानत आम होती है, जबकि जेल अपवाद होती है’… इतने दिन हो गए जेल में सड़ते… अब तो जमानत मिल जानी चाहिए थी।…
ऐसे ही तर्कों के जरिए आर्यन की ‘क्रूज नशा कहानी’ में हमदर्दी का इंजेक्शन लगाया जाता और आर्यन के पक्षधर सीधे प्रत्यारोप लगाने लगते कि आर्यन के पिता ने कभी सत्ता के खिलाफ कभी कुछ कहा था, इसलिए निशाने पर है।… ये बदले की कार्रवाई है!
ऐसी बालीवुडीय विलास कथाएं जब-जब आती हैं और जब-जब कोई बड़ा नाम फंसता है, तब-तब कुछ अज्ञात कुलशील और कुछ खर्च हुए एक्टर फंसने वाले के पक्ष में मुकदमा लड़ने जुट जाते हैं! आर्यन के पक्ष में भी ऐसे कई चेहरे जुटे दिखे! इसी क्रम में आर्यन के एक पक्षधर नेता जी तो यहां तक कह दिए कि वे नारको के अधिकारी की साल के भीतर नौकरी लेकर रहेंगे!
इसे देख चर्चित नारको अधिकारी का भी धैर्य चुक गया और वह भी प्रेस से कहने लगे कि उक्त नेता उन पर जो भी आरोप लगा रहे हैं, वह सब बेबुनियाद है। वे उनके माता-पिता का अपमान कर रहे हैं और वे उनके खिलाफ जरूरी कार्रवाई करेंगे!
लेकिन सबसे भयावह कुतर्क तब सामने आए, जब कुछ चैनलों में बांग्लादेश में हिंदू मंदिरों और पूजा पंडालों को जिहादी तत्वों द्वारा जलाने और कुछ लोगों को मार देने की घटनाओं पर कथित उदारतावादियों की कुछ जिहादियों जैसी टिप्पणियां सामने आईं। एक कांग्रेसी टाइप ने तो यहां तक कह दिया कि वहां जो हुआ वह यहां की प्रतिक्रिया में हुआ!
ये कैसे दिन आ गए हैं, जब बड़े-बड़े नामी चर्चक हर घटना को ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ की तरह व्याखायित करके जिहादी हत्यारों तक को अपराध मुक्त कर देते हैं! एक बहस में ऐसे ही एक कथित उदारतावादी चर्चक को तब भी शर्म नहीं आई जब एंकर ने कुछ पहले बहस में उसके बोले ऐसे ही कुतर्की बयान को दो-दो बार बजा कर दिखाया!
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From: Jansatta
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