आज भी यह सवाल बना हुआ है कि हमारा समाज बेटियों के जन्म को लेकर वाकई सकारात्मक हुआ है या नहीं। हाल ही में मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया, जिसमें एक मां ने अपनी ही तीन महीने की बेटी की हत्या कर दी। जब पुलिस ने छानबीन की तो पता चला कि हत्या का कारण पुत्र वियोग था। समझना मुश्किल है कि कोई पुत्र की लालसा में इतना निर्मम कैसे हो सकता है। एक सभ्य समाज के रूप में हमें ऐसे क्या प्रयास करने चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।
अगर बेटों का जन्म भाग्य से होता है, तो बेटियों का जन्म सौभाग्य से होता है और लोगों को इस बात से भी अवगत कराया जाना चाहिए कि आज केंद्र और राज्य दोनों बेटियों के सर्वांगीण विकास के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही हैं, जो इनके भविष्य को बेहद सशक्त बनाती हैं। समाज में मौजूद पितृसत्तात्मक मानसिकता को हमें जड़ से खत्म करना होगा।
फिर इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए खुद समाज को एकजुट होना पड़ेगा। हम इसको रोकने के लिए सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। अंतिम और महत्त्वपूर्ण उपाय है कि हमें अपनी दोषपूर्ण शिक्षा में व्यापक सुधार करना होगा, जिसमें प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक स्त्री के महत्त्व को समझाया जा सके।
’सौरव बुंदेला, भोपाल
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