स्त्री जिस तरह मानव जीवन में अर्धांगिनी के समान है, भारतीय जनतंत्र में भी उसका आधी व्यवस्था में हिस्सेदारी बनती है। देश की जनांकिकी का लगभग आधा हिस्सा इनका है, लेकिन स्वतंत्रता के चौहत्तर वर्षों के बाद भी देश की राजनीतिक व्यवस्था में नारियों की भागीदारी अपर्याप्त है। स्थानीय निकायों से लेकर देश की संसद तक महिलाओं का प्रतिनिधित्व अति न्यून रहा है। वर्तमान में हमारी लोकसभा में महिला सांसद पंद्रह फीसद से भी कम हैं, जबकि नेपाल में तीस प्रतिशत और चीन, बांग्लादेश तथा पाकिस्तान में बीस प्रतिशत से अधिक है। स्थानीय निकायों में चयनित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर पति प्रधान जैसी विसंगतियां विद्यमान हैं। यही कारण है कि आज भी देश में अधिकतर महिलाएं अपने अधिकारों से वंचित हैं।
देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराना होगा। देश की संसद और स्थानीय निकायों में महिलाओं को समुचित आरक्षण प्रदान कर उसे प्रभावी रूप से लागू करना होगा। महिला शिक्षा तथा महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित करने की भी आवश्यकता है। तभी हम महिला सशक्तिकरण को धरातलीय स्तर पर मूर्त रूप दे पाएंगे।
’वैभव दुबे, पलारी, मध्यप्रदेश
सुरक्षा कहां
‘दावे और हकीकत’ शीर्षक संपादकीय (20 अक्तूबर) कश्मीर घाटी में हुए आतंकी हमलों के शिकार लोगों की पीड़ा का दर्दनाक खुलासा करता है। केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को समाप्त करने के बाद आतंकवाद खत्म होने का दावा अब खोखला साबित हो रहा है। सरकार द्वारा बनाई गई सुरक्षा रणनीतियां देश की आवाम में अमन-चैन स्थापित कर पाने में विफल रही है। अल्पसंख्यकों की हत्याएं कामगारों को पलायन करने और पर्यटन तथा आर्थिक व्यवस्था कमजोर बनाने में आतंकी सरेआम सफल हो रहे हैं। ऐसे में आमजन की सुरक्षा कहां है?
’अनिल कौशिक, कैथल, हरियाणा
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