रोहित कौशिक
नैतिकता का अर्थ एक ऐसे जीवन से लगाया जाता है जिसमें नैतिक मूल्यों पर विशेष ध्यान दिया जाता हो और पूरी तरह से जीवन में इन मूल्यों का समावेश हो। व्यावहारिक रूप से देखें तो यह एक काल्पनिक अवधारणा लगती है। हम अपने जीवन में पूरी तरह से नैतिकता धारण नहीं कर सकते। जिंदगी में मोह और माया से बचना आसान नहीं है। जब मोह और माया विद्यमान रहेंगी तो पूरी तरह से नैतिक होने का सवाल ही नहीं उठता।
नैतिकता से दूर होने का एक कारण यह भी है कि समाज को नैतिकता पर बहुत बड़े-बड़े उपदेश और भाषण सुनने के लिए मिलते हैं। इन उपदेशों और भाषणों से व्यावहारिकता नदारद होती है। यानी नैतिकता पर केन्द्रित ये उपदेश बहुत पुराने हंै और हम बार-बार समाज को ये पुराने उपदेश ही सुनाते आ रहे हैं। इन उपदेशों को सुनते-सुनते समाज के कान पक गए हैं। किसी मुद्दे पर जरूरत से ज्यादा उपदेश समाज को उस मुद्दे से दूर ले जाते हैं। नैतिकता कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है कि हमारे सोचते ही हमारा व्यवहार नैतिकता से परिपूर्ण हो जाए। नैतिकता किसी के कहने, उपदेश देने या फिर उपदेश सुनने से पैदा नहीं होती है। नैतिकता हमारे अंतर में बिना किसी शोर-शराबे के पैदा होती है। यानी इतनी शान्ति से कि स्वयं हमें भी पता नहीं चलता है।
अक्सर जो लोग नैतिकता पर ज्यादा भाषण देते हंै या ज्यादा शोर-शराबा करते हैं वे नैतिकता के मामले में खोखले होते हैं। जब हम नैतिकता पर ज्यादा शोर-शराबा करने लगते हैं तो खोखली नैतिकता पैदा होती है। खोखली नैतिकता लगातार भ्रम उत्पन्न करती है। इस भ्रम के कारण हम और ज्यादा अनैतिक होते चले जाते हैं। इस तरह नैतिकता और अनैतिकता के बीच दूरी बढ़ती रहती है। जब यह दूरी बढ़ जाती है तो समाज में अनेक तरह की समस्याएं बिन बुलाए मेहमान की तरह आ जाती हैं। दरअसल नैतिकता के लिए हमें कुछ अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है।
अगर हम अपनी महत्वाकांक्षाओं को गलत ढंग से पूर्ण करने से बचे रहेंगे तो हमारे अंदर स्वयं नैतिकता पैदा हो जाएगी। हम अपनी महत्वाकांक्षाओं को गलत ढंग से पूरी करना चाहते हैं। इसलिए हम वे सभी गलत हथकंडे अपनाते हैं जो नैतिकता की राह में अवरोधक होते हैं। इस तरह हम अपने जीवन में कई झंझट पाल लेते हैं। ये झंझट हमारे जीवन को और उलझा देते हैं। हम ज्यों-ज्यों इन झंझटों से पीछा छुड़ाना चाहते हैं, त्यों-त्यों और उलझते चले जाते हैं। इस उलझन को सुलझाने के चक्कर में हम बार-बार कुछ ऐेसे क्रियाकलाप करते रहते हैं, जिससे बार-बार हमारी नैतिकता दांव पर लगती रहती है।
पिछले कुछ समय से हमारे समाज ने, विशेषत: युवा वर्ग ने नैतिकता सम्बन्धी विचारों को स्वार्थी और अनैतिक विचारों में तब्दील कर दिया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आधुनिक युवा ने कुछ अच्छा सोचा ही नहीं। वह निरन्तर अपने परिश्रम के बल पर आगे बढ़ता रहा लेकिन समाज की सामूहिक सोच में आश्चर्यजनक रूप से बड़ा बदलाव हुआ। आधुनिक युवा ने अपने जिंदगी को पूरी तरह से जी लेना चाहा। जिंदगी के हर पल को पूरी तरह से जी लेने का यह जज्बा कब मस्ती भरी जिंदगी में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला। मस्ती की इस जिंदगी में नैतिकता के परम्परागत मूल्य पुराने पड़ने लगे और नैतिकता की नई परिभाषा गढ़ी जाने लगी। इस हड़बड़ाहट में हम एक ऐसी राह पर चलने लगे, जिसमें कुछ उचित था तो कुछ अनुचित भी। हम बच्चों को नैतिकता पर उपदेश देने लगे लेकिन स्वयं अनैतिक बने रहे। बच्चों को नैतिक मूल्य विकसित करने वाली बातें जरूर बताई जानी चाहिए लेकिन यह सब व्यावहारिकता के धरातल पर होना चाहिए।
बच्चों को एक तरफ नैतिकता की बातें बताई जाती हैं लेकिन दूसरी तरफ वे व्यावहारिक जिंदगी में इन बातों को नदारद पाते हैं तो उनकी दुविधा और बढ़ जाती है। बच्चों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने से पहले हमें अपने जीवन में भी नैतिकता को स्थान देना होगा, तभी इस स्थिति में सुधार सम्भव है। इस दौर में जहां भी नैतिक मूल्यों और नैतिकता की बात होती है, वहां अक्सर ऐसी बातों को मजाक के तौर पर ले लिया जाता है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि नैतिकता को मजाक की चीज न समझा जाए। हम ईमानदारी से अपना कर्म करते रहें तो नैतिकता के सारे गुण हमारे अंदर आ जाएंगे। हमें यह समझना होगा कि इस दौर में नैतिकता की कच्ची डोर अनेक समस्याओं की जड़ है।
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