Friday, September 10, 2021

पिघलते हिमनद

अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के एक संगठन ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट’ और देहरादून स्थित हिमालयन ग्लेशियरों या हिमनदों के अध्ययन के लिए बनाए गए भारतीय वैज्ञानिक शोध संस्थान ‘वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी’ के वैज्ञानिकों ने ‘हिंदूकुश हिमालय एसेसमेंट’ नामक अध्ययन के तहत हिमालय के तेजी से पिघलते ग्लेशियरों का पिछले पांच वर्षों तक गहन अध्ययन किया। उसके अनुसार अगर मानव द्वारा प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन की गति यही बनी रही और दुनिया के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस ही बढ़ोतरी हुई तो सन 2100 तक इन ग्लेशियरों के एक तिहाई पिघल जाएंगे और अगर यह तापमान बढ़ कर दो डिग्री सेल्सियस हो गया तब इनका दो तिहाई हिस्सा सदा के लिए पिघल जाएगा।

इन वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा के उद्गम स्रोत के मुख्य ग्लेशियर का एक प्रमुख सहायक ग्लेशियर ‘चतुरंगी गलेशियर’ पिछले सत्ताईस साल में भारतीय महाद्वीप में भयंकर प्रदूषण, हिमालयी क्षेत्र में अंधाधुंध वनों के विनाश, नदियों और वायु प्रदूषण के चलते काफी पिघल चुका है और इसकी बर्फ में चिंताजनक कमी हुई है। पेरिस जलवायु सम्मेलन से अमेरिका जैसे देश के हट जाने से दुनिया पर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा और बढ़ गया है!

विडंबना है कि जिन नदियों के किनारे और जिनकी बदौलत मानव सभ्यता फली-फूली और विकसित हुई, जिन नदियों के उपजाऊ मैदानों में, जिनके पानी से सिंचिंत खेत से मानव जीवन की सबसे बड़ी जीवन की आवश्यकता भूख की समस्य’ को, अपने प्रचुर मात्रा में अन्न उपजा कर देने वाली, अपने निरंतर जल प्रवाह से प्राचीन काल से ही मानव के व्यापार में अपना अमूल्य योगदान देने वाली, अपने अमृत तुल्य मीठे जल से मानव सहित समस्त जीव-जगत की प्यास बुझाने वाली और इस प्रकृति की सबसे अद्भुत रचना रंग-बिरंगी मछलियों सहित लाखों जलचरों की आश्रय स्थल रहीं, अब वही मनुष्य हमारी मातृतुल्य नदियों का दम घोंटने और प्राण लेने के लिए आमादा है।

गंगा सहित और हिमालय से निकलने वाली सभी नदियों के उद्गम स्रोत सूख जाने के बाद वाली उस भयावह स्थिति की कल्पना मात्र से ही मन-मस्तिष्क सिहर उठता है। इन नदियों के सूखने पर पूरे उत्तर भारत में भयंकर सूखे से अन्न उत्पादन लगभग शून्य हो जाएगा, क्योंकि भूगर्भीय जल की मुख्य स्रोत भी उत्तर भारत में फैली इन छोटी-बड़ी नदी नालों के निरंतर जल प्रवाह से ही रिचार्ज होता रहता है। कथित विकास और सड़क चौड़ीकरण के नाम पर नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी को छेड़ने से अगर गंगा सूख गई तो इसके बेसिन में रहने वाले भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश आदि देशों के एक अरब पैंसठ करोड़ लोगों के साथ पर्वतीय देश नेपाल के भी पच्चीस करोड़ लोग भूख और प्यास से मर जाएंगे!

पेरिस जलवायु सम्मेलन से अमेरिका जैसे देशों के हट जाने से दुनिया पर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा और बढ़ गया है! इसलिए हम भारत के लोगों की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि हम अपनी इन जीवनदायिनी समस्त नदियों के उद्गम स्रोत यानी लाखों सालों से बर्फ से जमे ग्लेशियरों को हर हालत में बचाना चाहिए।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र

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From: Jansatta

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