विचार की संस्कृति ही सही मायने में जीवन जीने को दिशा देने का काम करती है। जब आप किसी विषय पर विचार करते हैं तो उसे संपूर्णता में देखते हैं। एक विचार उठता है कि यह करना है, और आदमी चल पड़ता है। मन को कार्य करने के लिए विचार प्रेरित करता है। वह बताता है कि हमारी जरूरत क्या है और हमारे पास संसाधन क्या हैं। हो सकता है कि कोई विचार किसी एक व्यक्ति के मन में एक समय में आए और वह समाज को पसंद आ जाए, समाज के लिए उपयुक्त हो और पूरा समाज ही उसे स्वीकार कर ले। ऐसी स्थिति में विचार की सामाजिकता ही केंद्र में होती है और उस विचार के साथ पूरा समाज लग जाता है।
दरअसल, विचार एक पूंजी निवेश है, जिससे समाज के भले के लिए हम आगे बढ़ते हैं। विचार के साथ वैचारिक धरातल पर चलते हुए ही समाज को सही दिशा दी जा सकती है। विचार एक समय से दूसरे समय तक चलते रहते हैं। इस तरह हम विचार की अनंतता को जीते हैं। विचारों की इस अनंतता में जीवन तंत्र को सुव्यवस्थित करने के सूत्र होते हैं। विचार के सूत्र जीवन को दिशा देने का कार्य करते हैं। इस पर चलने के लिए एक नियम, आचरण पद्धति और जीने की अंत:स्वतंत्रता को रेखांकित करने की जरूरत महसूस होती है। आप विचार कुछ और करें और जीने का रास्ता कुछ और ढूंढ़ ले, ऐसा संभव नहीं होता। जिस तरह से जैसे सोचते हैं, वैसे जीना पड़ता है।
हो सकता है कि किसी समाज में सीधे-सीधे प्रत्यक्ष कार्रवाई होते हुए दिख जाती है, पर जो कुछ भी कार्य रूप में हो रहा होता है, उसके पीछे विचार की एक शृंखला चिंतन-मनन प्रक्रिया से होकर चलती रहती है। एक समय में हम जो कुछ सोचते हैं, वही अगले क्षण कार्य रूप में व्यवहार रूप में परिवर्तित हो जाता है। जो कल हो गया था, वह जरूरी नहीं कि आने वाले समय में न हो। आने वाले समय में भी वह घट सकता है और तमाम घटनाएं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हमारी विचार शृंखला की जीवित कार्यवाही का परिणाम होती हैं। इसीलिए यह बराबर कहा जाता है कि हमें अपनी विचार प्रक्रिया को सुव्यवस्थित सुदृढ़ और जीवन के ऐसे उपयोग क्षेत्र में करना चाहिए, जहां से जीवन की गतिशीलता और प्रगति का बोध होता हो। हमारे विचार मूल रूप से मनुष्य की प्रगति के सूचक दिशा की ओर चलने चाहिए। ऐसा कोई विचार समाज सभ्यता और संस्कृति के परिदृश्य में स्वीकार नहीं किया जाता जो हमें पीछे की ओर लौटा ले चले। मनुष्य के पैर हमेशा आगे की ओर बढ़ते हैं। प्रकृति की प्रत्येक घटना में आगे की घटना छिपी होती है।
मनुष्य की प्रगति वैज्ञानिक सोच, लोकतांत्रिक चेतना और स्वातंत्र्य बोध के साथ जुड़ी होती है। जब तक हम वैज्ञानिक तरीके से दुनिया को संसार को नहीं देखते, तब तक वास्तव में दुनिया को समझ पाना मुश्किल होता है। वैज्ञानिकता से अभिप्राय है कि हर तरह के भेदभाव से ऊपर उठ कर वस्तु सत्य और वस्तु को हम स्वीकार करें। आशय यह कि किसी भी बात को यों ही न स्वीकार करें कि कोई कह रहा है। स्वीकारने से पहले उसकी परीक्षा करें, उसे अपनी कसौटी पर कसें और मानवीय बोध में जो विवेक की कसौटी है, उस पर हर विचार को वैज्ञानिक तरीके से कसने के बाद ही हम आगे बढ़ते हैं। इस तरह से हमारी जीवन प्रणाली में लोकतांत्रिक चेतना जन्म लेती रहती है। लोकतंत्र चेतना की उपस्थिति और जीवन दशा बन जाती है तो यह सामाजिक प्रगति और खुशहाली का रास्ता भी हो जाती है।
लोकतंत्र से अभिप्राय हम सबकी सुनें और सुन कर किसी निर्णय पर पहुंचे। केवल हमारा सत्य ही सत्य नहीं है, बल्कि जो सामने है, अन्य व्यक्ति है, अन्य संसार है, अन्य समाज है, वह क्या कुछ कह रहा है, उसके कथन को उसकी सत्यता, उसके विचार को हमें स्वीकार करने की योग्यता विकसित करनी होगी। स्वीकार करने की योग्यता ही लोकतांत्रिक चेतना है। लोकतांत्रिक चेतना दूसरे को स्वीकार करने की शक्ति देता है। यह हमें हमारी स्वतंत्रता के साथ-साथ अन्य की स्वतंत्रता का सम्मान करना सिखाता है।
इसीलिए दुनिया की तमाम प्रचलित व्यवस्थाओं में मनुष्य के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी और स्वीकार विचारधारा के रूप में लोकतांत्रिक चेतना ही एक कारगर व्यवस्था है। लोकतंत्र मनुष्य का मनुष्य के रूप में सम्मान करना सिखाता है। इसी के साथ यह कहा जाना भी जरूरी लगता है कि स्वतंत्रता का मूल्य मनुष्य का एक नैतिक बोध है। आप स्वतंत्र चेतना के हैं, यानी आपके भीतर एक नैतिक चेतना विद्यमान है जो अन्य की स्वतंत्रता का सम्मान करती है और आपके भीतर न्याय, करुणा, सत्य और शील का प्रदर्शन कराती है। इस तरह से वैज्ञानिक चेतना को स्वीकार करते हुए लोकतांत्रिक चेतना के साथ स्वतंत्रता का बोध ही मनुष्य की विचार यात्रा में सामाजिक प्रगति का सबसे बड़ा साधन है, जिसमें वह जीवन निर्माण करता रहता है।
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