वर्तमान दौर के इलेक्ट्रॉनिक युग में अंग्रेजी शब्दों को हिंदी में से निकालना बड़ा ही दुष्कर कार्य है। दूसरी ओर हिंदी व्याकरण और वर्तनी का भी बुरा हाल है। कोई कैसे भी लिखे, सुधार कोई नहीं करना चाहता है। इस भाग-दौड़ की दुनिया में शायद बहुत कम लोग ही होंगे जो इस और ध्यान देते होंगे। मसलन, कोई लिखता है कि लड़की ससुराल में ‘सूखी’ है, जबकि सही यह है कि लड़की ससुराल में ‘सुखी’ है। यह सिर्फ उद्धरण भर था। ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे।
विधार्थियों को अपनी सृजनात्मकता, मौलिक चिंतन को विषय के रूप में हिंदी व्याकरण और वर्तनी में सुधार की ओर ध्यान देना चाहिए, ताकि निर्मित शब्दों का हिंदी में परिभाषित शब्द सही तरीके से व्यक्त हो सके। हिंदी भाषा त्रुटिरहित होकर अपनी गरिमा बनाए रख सके। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए हर लेखनीय कार्य हिंदी में ही अनिवार्य करना होगा, ताकि हिंदी लिखने की शुद्धता बनाई जा सके। इनके अलावा, हमें क्षेत्रीय बोलियों पर भी ध्यान देना होगा।
बोलियों के प्रति उदासीनता के चलते आने वाले वर्षों में कई बोलियां विलुप्ति की कगार पर जा पहुंचेंगी। बोलियों को संरक्षण देने के जो भी प्रयास वर्तमान में किए जा रहे हैं, उनकी प्रगति बेहद धीमी है। कारण यह भी है कि क्षेत्रीय लोग ही अपनी-अपनी बोलियों में आपस में बात करने से पहरेज करने लगे हैं। उन्हें शायद ऐसा लगता है कि हमारा खड़ी बोली बोलने का स्तर इससे प्रभावित होगा।
कई जगह लोक परिषद् भी शब्द कोष, व्याकरण और अलंकारों को बढ़ाने और सहेजने का प्रयत्न कर रही है। इन्हीं प्रयासों से क्षेत्रीय बोलियों के विलुप्त होने का खतरा टल सकेगा। साथ ही नागरिकों की संस्कृति विशेष की पहचान भी बढ़ेगी। इनके अलावा, बोलियों मे बदलाव रुकेगा और मूल शुद्धता बरकरार रहेगी। बोलियों के जरिए क्षेत्रीय बोलियों को बढ़ावा देने के लिए बोलचाल को बढ़ाना होगा, तभी क्षेत्रीय बोलियों को विलुप्त होने से बचाया जा सकेगा।
’संजय वर्मा ‘दृष्टि’, मनावर, धार, मप्र
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