Monday, August 23, 2021

जलवायु परिवर्तन : सिकुड़ सकता है इंसान का दिमाग


जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर लंबे समय से वैज्ञानिक और पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं। पूरी दुनिया इसके खतरों की काट ढूंढने में जुटी है। हाल में चौंकाने वाला एक शोध सामने आया है। वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के एक नए खतरे का पता लगाया है। धकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से इंसान का कद घट रहा है और दिमाग सिकुड़ रहा है। लाखों साल में जलवायु परिवर्तन का असर इंसान पर पड़ा है। कैंब्रिज और टबिजेन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पूरी दुनिया में इंसानों के तीन सौ जीवाश्मों की जांच कर शोध किया है। यह शोध ‘नेचर कम्युनिकेशन जर्नल’ में छपा है।

जिस तरह से हर साल तापमान में इजाफा हो रहा है, उसे देखते हुए यह शोध काफी अहम है। शोध में सामने आया कि इंसानों के हर जीवाश्म ने जलवायु परिवर्तन की मार झेली है। अफ्रीका में इंसानों की प्रजाति होमो की उत्पत्ति तीन लाख साल पहले हुई थी, लेकिन ये जीवाश्म इससे भी ज्यादा पुराने हैं। ये जीवाश्मों में इंसानों की और प्रजातियों के हैं, जैसे- नियंडरथल्स, होमो इरेक्टरस, होमो हेबिलिस। इंसानों के विकास के तमाम सिद्धांतों के मुताबिक, मानव का शरीर और मस्तिष्क का आकार बढ़ता रहा है।

वर्तमान इंसान की तुलना में होमो हेबिलिस 50 गुना अधिक भारी थे और इनका दिमाग तीन गुना तक बड़ा था।कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एंड्रिया मेनिका के मुताबिक, लाखों साल से तापमान शरीर के आकार में बदलाव लाने वाला अहम कारक रहा है। जिस तरह आज ठंडी जलवायु वाली जगहों पर इंसान का शरीर बढ़ता है और गर्म तापमान वाले क्षेत्र में रहने वालों का शरीर छोटा होता है, उसी तरह जलवायु परिवर्तन ने हमेशा से ही इंसान के शरीर पर असर डाला है।‘नेचर कम्युनिकेशन जर्नल’ में छपे शोध के मुताबिक, इंसान का शरीर अलग-अलग तरह के तापमान के साथ खुद को समायोजित कर लेता है। करीब 11,650 साल पहले से ही इंसान का दिमाग सिकुड़ना शुरू हो गया था।

संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी : जलवायु परिवर्तन के विज्ञान पर हाल में जारी संयुक्त राष्ट्र जलवायु पैनल की रिपोर्ट में भविष्य के लिए पांच संभावित परिदृश्यों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में गंभीर समस्या की चेतावनी दी गई है। कहा गया है कि समस्या से निपटना इस बात पर निर्भर करता है कि मनुष्य कितनी जल्दी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को रोकता है। समस्या से निपटने के लिए जनसंख्या, शहरी घनत्व, शिक्षा, भूमि उपयोग और धन जैसे क्षेत्रों में सामाजिक आर्थिक परिवर्तनों को भी काबू करना है।

उदाहरण के तौर पर जनसंख्या में वृद्धि यानी जीवाश्म ईंधन और पानी की मांग बढ़ जाना। जब भूमि को वन से कृषि भूमि में परिवर्तित किया जाता है तो उत्सर्जन में वृद्धि होती है। सभी देशों ने 2015 के पेरिस जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसका उद्देश्य ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री सेल्सियस (3.6 डिग्री फारेनहाइट) से नीचे रखना है। तीन हजार से अधिक पृष्ठ की रिपोर्ट का निष्कर्ष निकला है, बर्फ पिघल रही है और समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। वैज्ञानिक साफ तौर पर बार-बार कह रहे हैं कि 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य शायद अब पहुंच से बाहर है, क्योंकि एक डिग्री सेल्सियस से अधिक की गर्मी पहले ही पड़ चुकी है।

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From: Jansatta

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