रूपा
अध्यात्म को सामाजिक बदलाव के औजार के तौर पर देखने की हसरत अगर आज कोई मन में रखे तो इसे या तो अव्याव्हारिक कहेंगे या सीधे-सीधे ऐसा जोखिम जिसे उठाने का नैतिक साहस कहीं नजर नहीं आता। इस दुस्साहस को नए विचार-भाष्य और आचरण के साथ पूरा करने का प्रतापी साहस जिस तरह विनोबा भावे में दिखाई पड़ता है, उसका कम से कम आजादी के बाद के भारत के इतिहास में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। वैसे यह उदाहरण विश्व इतिहास के लिए भी अनूठा ही है।
विनोबा जब भूदान-पदयात्रा पर थे तो ‘टाइम’ पत्रिका ने अपने आवरण पर उन्हें स्थान देते हुए लिखा कि यह शख्स सबको प्रेम से लूटने आया है। दरअसल, विचार और बदलाव का यह वही रास्ता है जो विनोबा की सकर्मक प्रेरणा रहे महात्मा गांधी की भी राह है। ऋषि और कृषि की संस्कृति वाले देश में विनोबा हमारे सामने एक ऐसे संत के तौर पर सामने आते हैं जो आधुनिकता के बीच सात्विकता की स्थापना का सूत्र देते हैं। वे एक ऐसे खोजी रहे, जिन्होंने अध्यात्म की युगानुकूल नई व्याख्या की और अध्यात्मविद्या को विकास की नई दिशा और नए आयाम प्रदान किए।
उनका अध्यात्म मठों और संप्रदायों में सिमटने वाला नहीं था, वह सीधे कर्मक्षेत्र में साहसी प्रयोगों में प्रकट हुआ। अध्यात्म में वे जितने गहरे उतरे, उतने सामाजिक शास्त्रों में भी उतरे। उनका चिंतन महज शाब्दिक नहीं था। कर्मयोग के आचरण और कठिन साधना से वह निकला था। घटनाओं, प्रवाहों के पीछे काम कर रही सूक्ष्म शक्तियों को उनकी पैनी नजर पकड़ लेती थी। इसीलिए उनके विचार न केवल आज भी प्रासंगिक हैं, बल्कि सदियों तक मनुष्य जाति का मार्गदर्शन करने की क्षमता रखते हैं।
स्वाधीनता संघर्ष के दौरान 1932 में उन्होंने पुलिया जेल में रहते हुए गीता पर जो प्रवचन दिए, वह ‘गीता-प्रवचन’ के रूप में विश्व साहित्य की अनूठी कृति है। यह गीता का और एक और भाष्य न होकर मनुष्य को शुभ की प्रेरणा देकर श्रेय की ओर अग्रसर करने की शक्तिरखने वाली एक मौलिक कृति है। 24 भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी इस पुस्तक की 25 लाख से ऊपर प्रतियां बिक चुकी हैं। ‘गीता-प्रवचन’ गीता का संदेश तो है ही, वह विनोबा का भी जीवन-संदेश भी है। इससे पहले 1930- 31 में विनोबा ने ‘गीताई’ की रचना की थी। ‘गीताई’ गीता का मराठी में समश्लोकी अनुवाद के साथ भाष्य भी है और इसमें विनोबा के अनुभव और मान्यताएं भी शामिल हैं। इसकी सरल, लेकिन प्रसादपूर्ण काव्य-शैली की खूब सराहना हुई है। विनोबा चाहते थे कि ‘गीताई’ महाराष्ट्र के घर-घर में पहुंचे। अब तक उसकी 34 लाख प्रतियां निकल चुकी हैं। विनोबा ने स्वयं माना है कि ‘गीताई’ और ‘गीता-प्रवचन’ उनकी विरासत हैं।
देश को आजादी मिली तो कुछ ही दिनों में एक बड़े शून्य ने भी घेर लिया। महात्मा गांधी की हत्या से देश विभाजन की पीड़ा और गहरी हुई। रिक्तता की इस चुनौती को विनोबा ने समझा। मार्च, 1948 में सेवाग्राम में हुए रचनात्मक कार्यकर्ता सम्मेलन में उन्होंने ‘सर्वोदय समाज’ की कल्पना प्रस्तुत की और बाद में ‘सर्वोदय’ शब्द का विवरण और भाष्य करते रहे। 18 अप्रैल 1951 को भूदान आंदोलन का बीज पड़ा। यह बीजारोपण था आस्था की संस्कृति के क्रांतिकारी कल्प के तौर पर तैयार होने का।
पैंसठ हजार किलोमीटर की भूदान-पदयात्रा के दौरान विनोबा ने ‘दान’ शब्द को नया अर्थ दिया- ‘दानं संविभाग:।’ शास्त्रवचन को सामाजिक बदलाव के तौर पर पेश करने का यह अनूठा प्रयोग था। शास्त्रों से युगानुकूल वचन ढूंढना तथा शास्त्रवचनों को नया अर्थ देना, यह विनोबा की खासियत थी। उनका मानना था कि यह अहिंसक क्रांति की प्रक्रिया का एक अंग है और भारत में यह परंपरा चलती आई है।
विनोबा सम-विभाग के लिए अधिकार के तौर पर जमीन मांगते थे। जमीन का बंटवारा उनके लिए निमित्त मात्रथा। वे अहिंसा से भारत सहित विश्व की समस्याओं का समाधान ढूंढना चाहते थे। भूदान में वे अहिंसक क्रांति और विश्वशांति के बीज देख रहे थे। कई पावन प्रसंग भूदान पदयात्रा में घटित हुए। मनुष्य के हृदय में भलाई मौजूद रहती है और उसे जगाया जा सकता है, इसका अद्भुत लोकदर्शन हुआ। विनोबा के रूप में यह पूरी दुनिया के लिए अहिंसक क्रांति के नए चरण को देखने-परखने का दौर था। चांडिल सर्वोदय सम्मेलन में उन्होंने ‘हिंसा-शक्तिकी विरोधी और दंड-शक्ति से भिन्न तीसरी शक्ति’ की अवधारणा प्रस्तुत की। ‘लोक’ की समझ को उन्होंने एक ‘पोएटिक नॉस्टेलजिया’ से आगे एक जागतिक और जागृत शक्ति के तौर पर देखा। अहिंसक समाज-रचना के साथ यह लोकतंत्र की भी नई समझ थी। दादा धर्मााधिकारी ने विनोबा के बारे में कहा भी है- ‘विनोबा ने क्रांति की प्रक्रिया को ललित कला की माधुरी अर्पित की।’
एक ऐसे समय में जब भय, नफरत और विकास की कुबेरी समझ एक साथ हमारी समझ और प्रवृत्ति को अकल्याणकारी गंतव्य की ओर ले जा रही है तो विनोबा का शास्त्रबोध और उससे निकली लोकशक्ति की समझ हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जा सकती है। ल्ल
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