Tuesday, August 24, 2021

समान अवसरों का संकट

मोनिका शर्मा

सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता लाने वाले फैसले समाज और परिवार के पूरे मनोविज्ञान पर असर डालते हैं, साथ ही बेटियों को कमजोर या कमतर समझे जाने की मानसिकता पर भी चोट करते हैं। ये फैसले लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण जैसे पहलुओं पर समानता लाने और आगे बढ़ाने का परिवेश बनाते हैं।

सेना हो या कोई भी अन्य क्षेत्र, आज भी महिलाओं की मौजूदगी को आसानी से स्वीकार्य नहीं किया जाता। उनकी बढ़ती भगीदारी को लेकर असहज स्थितियां आज भी मौजूद हैं। सहयोगी व्यवहार भी नदारद है। हर कदम पर व्यवधान पैदा करने की कोशिशें हैं। रुकावट न भी डाली जा सके तो देरी करने या टालने की प्रवृत्ति तो घर से लेकर दफ्तर तक हर जगह देखी जा सकती है।

ये बातें हाल में महिला उम्मीदवारों को एनडीए परीक्षा में बैठने की अनुमति देने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई दौरान देश की सर्वोच्च अदालत ने कही थीं। बेटियों की शिक्षा और लैंगिक विभेद मिटाने की नई लकीर खींचने वाले इस फैसले में उच्चतम न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी करते हुए न केवल महिला उम्मीदवारों को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) की परीक्षा में शामिल होने की छूट दी है, बल्कि यह भी कहा है कि सेना खुद खुलापन दिखाए।

हर बात के लिए अदालत के दखल का इंतजार क्यों? गौरतलब है कि शीर्ष अदालत ने एनडीए परीक्षा को लेकर सेना के नीति निर्णय को लैंगिक समानता के लिहाज से भेदभावपूर्ण माना है। हालांकि अब अदालत के अंतरिम आदेश के बाद महिलाएं आगामी सितंबर में होने वाली राष्ट्रीय रक्षा अकादमी की प्रवेश परीक्षा दे सकेंगी। सर्वोच्च अदालत का यह फैसला लैंगिक भेदभाव दूर करने की दिशा में अहम साबित होगा।

दरअसल इस मामले में भी एक बार फिर यही सामने आया है कि बेटियां तो हर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने के लिए जी-जान से जुटी हैं, पर उनकी भागीदारी को लेकर सहजता का परिवेश अब तक नहीं बन पाया है। सेना में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में हो रही देरी भी इसी का उदाहरण है। जबकि बीते वर्ष फरवरी में आए उच्चत्तम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले में महिलाओं को कमांड तैनाती के योग्य बताते हुए अदालत ने केंद्र सरकार को उन्हें स्थायी कमीशन दिया जाना सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया था।

सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिए जाने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्त्रियों को सही मायने समानता देने की बात लिए हुए था। सर्वोच्च अदालत ने इस अहम फैसले में कहा था कि उन सभी महिला अफसरों को तीन महीने के अंदर सेना में स्थायी कमीशन दिया जाए, जो इस विकल्प को चुनना चाहती हैं। अदालत ने सरकार की उस दलील को निराशाजनक बताया था जो महिलाओं को कमांड तैनाती न देने के पीछे शारीरिक क्षमताओं और सामाजिक मानदंडों का हवाला देने वाली रही थीं। अदालत का कहना था कि सामाजिक और मानसिक कारण बता कर महिलाओं को इस अवसर से वंचित करना न केवल भेदभावपूर्ण है, बल्कि अस्वीकार्य भी है।

व्यापक रूप से समझा जाए तो हमारे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में महिलाओं से साथ होने वाले हर तरह के भेदभाव की जड़ में उनकी शारीरिक क्षमताओं को कम आंकना और सामाजिक मोर्चे पर पीछे समझा जाना ही है। कहना गलत नहीं होगा कि हमारे यहां योग्यता और क्षमता के बावजूद स्त्री होने भर से कई मोर्चों पर पीछे रह जाने की पीड़ा को जीने वाली महिलाओं के लिए समानता का भाव आज भी नदारद है। जबकि बीते कुछ बरसों में महिलाओं ने हर मोर्चे पर खुद को साबित किया है। अंतरिक्ष से लेकर सामाजिक मुद्दों की आवाज बनने की कई उपलब्धियां अपने ही नहीं, देश के हिस्से में भी आई हैं।

ऐसे में उनकी भागीदारी को विस्तार देने वाले फैसले समाज की सोच को नई दिशा देने वाले साबित हो सकते हैं। गौरतलब है कि अभी तक हमारे देश में एनडीए और नौसेना अकादमी में महिलाओं की भर्ती नहीं की जाती है। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि प्रगतिशील सोच और तकनीकी बदलावों के इस दौर में भी योग्य और इच्छुक महिला उम्मीदवारों को अब तक उनके लैंगिक विभेद के आधार पर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रवेश पाने से क्यों रोका गया? इतना ही नहीं, स्थायी कमीशन देने को लेकर पिछले साल आए अदालत के फैसले से पहले महिलाओं के नेतृत्वकारी भूमिका में आने में भी कई बाधाएं रही हैं।

आधी आबादी के जीवन को लगभग हर मोर्चे पर बदलाव का इंतजार है। महिलाओं को लेकर देश के कोने-कोने से प्रतिगामी सोच और तुगलकी फरमानों की खबरें भी आए दिन आती रहती हैं। दुखद है कि इस सोच से निकले बिना भेदभाव और दोयम दर्जे की स्थिति घरेलू ही नहीं, कामकाजी परिवेश में भी बनी रहेगी। यही वजह है कि उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और सैनिक स्कूलों में महिलाओं को मौका न देने के लिए भारतीय सेना को आदिम मानसिकता बदलने के लिए कहा है।

ध्यान रहे लड़कियों के लिए सैनिक स्कूलों में पढ़ने के रास्ते भी हाल में खुले हैं। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री ने सैनिक स्कूल में छात्राओं के नामांकन की घोषणा की थी। विचारणीय है कि यह हक भी लड़कियों को आजादी की आधी सदी से ज्यादा का समय बीत जाने की बाद मिल रहा है। जबकि शिक्षा, सजग विचार और अपने सपनों को पूरा करने का माद्दा लिए लड़कियां अब हर क्षेत्र में कामयाबी का परचम लहरा रही हैं। इसी साल एअर इंडिया की महिला पायलटों ने दुनिया की सबसे लंबी उड़ान का रिकॉर्ड बनाया था।

महिला पायलटों की यह टीम उत्तरी ध्रुव पर दुनिया के सबसे लंबे हवाई मार्ग से सैन फ्रांसिस्को से बंगलूर पहुंची थीं। कुछ ही समय पहले भारतीय नौसेना में भी पहली बार दो महिला अधिकारियों की तैनाती युद्ध पोत पर की गई। नौसेना में महिलाओं को यह अहम जिÞम्मेदारी मिलना ऐतिहासिक बदलाव और सैन्य क्षेत्रों में महिलाओं की सहभागिता से जुड़े मोर्चे पर एक नई शुरूआत है।

अब भारतीय वायुसेना में शामिल हुए राफेल विमान उड़ाने के लिए भी महिला पायलटों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पहली बार थल सेना में भी महिला अधिकारियों के पायलट की बनने की राह खुली है। सेना से इतर देखें तो हाल के बरसों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अहम अभियानों में भी महिलाओं ने बड़ी भूमिका निभाई है। मंगल अभियान के दल में अहम भूमिका निभाने के बाद अब गगनयान मिशन-2022 से के दल में भी महिला शक्ति को खास जगह मिली है।

महिलाएं देश के मानव संसाधन का अहम हिस्सा हैं। खेल का मैदान हो, राजनीति हो या फिर ज्ञान-विज्ञान की दुनिया, महिलाओं की भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती। असल में देखा जाए तो देश, समाज और परिवार में उचित सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए भी महिलाओं की भागीदारी बढ़नी जरूरी है। ऐसे में कामकाजी क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव और सशक्त भागीदारी से जुड़ा हर नया कदम महिलाओं के मन-जीवन से जुड़े हालात को गहराई से प्रभावित करता है।

सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता लाने वाले फैसले समाज और परिवार के पूरे मनोविज्ञान पर असर डालते हैं, साथ ही बेटियों को कमजोर या कमतर समझे जाने की मानसिकता पर भी चोट करते हैं। ये फैसले लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण जैसे पहलुओं पर समानता लाने और आगे बढ़ाने का परिवेश बनाते हैं। घर ही नहीं, दफ्तर में भी उनकी जरूरतों और सहूलियतों पर सोचने को मजबूर करते हैं। ऐसे सभी पहलू आधी आबादी के प्रति दोयम दर्जे की सोच को बदलने की पुख्ता बुनियाद बनाते हैं। निस्संदेह न्यायालय का यह निर्णय लड़कियों के प्रति विचार और व्यवहार बदलने और हर कार्य क्षेत्र में उनकी भागीदारी की सम्मानजनक स्वीकार्यता बढ़ाने का सकारात्मक संदेश लिए हुए है।

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From: Jansatta

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