नरपतदान चारण
अज्ञान से जब नफरत और कुकृत्य बढ़ने लगे तब हमें अपने जीवन के उद्देश्य का मनन करना चाहिए। और ये जीवन के उद्देश्य कहीं और नहीं बल्कि हमारे मन मस्तिष्क के चिंतन की गहराई से प्राप्त हो सकते हैं। ऋषियों, महात्माओं और संतों ने तप, ध्यान और त्याग से व्यावहारिक जीवन के उद्देश्य जाने समझे। उनके अनुसार जीवन का सर्वोपरि या परम उद्देश्य परोपकार है।
यह उद्देश्य पूरा करके ही कोई कह सकता है कि उसने सफल जीवन जिया। सफल जीवन की कसौटी धन और सम्पत्ति नहीं है, ये तो केवल सहायक साधन मात्र है। हालांकि जीवन का कोई एक उद्देश्य नहीं होता। लेकिन जीवन अवसर है उद्देश्य तय करने का, स्वयं को जानने का, अपनी अंतर्निहित शक्ति और प्रतिभा को जानने और विकसित करने का। जीवन के असंख्य आयाम है, इन सभी आयामों में महत्तम विकसित होना और श्रेष्ठ और कल्याणकारी अस्तित्व और व्यक्तित्व का निर्माण करना ही जीवन का परम उद्देश्य है। इसलिए यदि आपने कोई उद्देश्य निर्धारित नहीं किया है तो जीवन निरर्थक है। और उद्देश्य भी स्वार्थपरक न होकर परमार्थपरक होना चाहिए, फिर उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जीवन देने वाले को असीम सुख मिलता है।
जीवन का रहस्य भोग में नहीं, बल्कि दूसरों के सहयोग में है। इसलिए आदमी को चाहिए कि परोपकारी जीवन बिताए न कि पापी। परोपकार करनेवाले इस दुनिया में खुश रहते हैं। अत्याचार की मुखालफत के लिए इंसान का जीवन प्राप्त हुआ है। बुरे धागों में बुने हुए समय के वस्त्र को हम जीवन का नाम दे सकते हैं।
सदैव ध्यान रखें कि हम ही जगत की आत्मा है, हमीं सूर्य, चन्द्र, तारे हैं, हमीं सर्वत्र चमक रहे हैं, समस्त जगत हमीं से है। फिर किससे घृणा करोगे और किससे झगड़ा करोगे अतएव जान लो कि हम वही है और इसी रुचि में अपना जीवन ढालो। ये करुणामय हृदय ईश्वर का मन्दिर है। अपना जीवन गुलाब की तरह बनाओ जो सुगन्ध की भाषा में शान्तिपूर्वक वातार्लाप करता है। सदा अपने मन को परहित और कल्याण में बिताएं तो आप हजारों हानियों एवं परेशानियों से भी बच जाएंगे। जिसके जीने से बहुत से लोग जीवित हैं, वही इस संसार में जीता हुआ रहता है।
परोपकर रहित जीवन, सिद्धान्त रहित जीवन है और सिद्धान्त रहित जीवन पतवार रहित नौका के समान है। जीवन संघर्ष में वही सफल होते हैं, परमार्थ की शिक्षा प्राप्त की हो। जीवन के लिए खाना और सोना जरूरी है लेकिन जीवन पारमार्थिक कार्यों से सफल होता है। यही ध्यान रखें कि मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए काम आए। अपने लिए तो सभी जीते हैं लेकिन जीवन उसका सफल है जो दूसरों की भलाई करे।
संसार में परोपकार ही वह गुण है जिससे मनुष्य के जीवन में सुख की अनुभूति होती है। समाज सेवा की भावना, प्रेम की भावना, दान की भावना, दुख में पीड़ित लोगों की सहायता करने की भावना यह सब कार्य परोपकारी है। इसके विपरीत परपीड़ा अर्थात दूसरों को कष्ट पहुंचाने से बढ़कर कोई नीचता का कार्य नही हो सकता। वहीं परहित नि:स्वार्थ होना चाहिए। जहां स्वार्थ का भाव आ गया, वहां परहित रहता ही नही।
यदि किसी की भलाई, बदले में कुछ लेकर की तो वह भलाई नहीं एक प्रकार का व्यापार है। परोपकार की भावना से मनुष्य के हृदय में सुख की अनुभूति होती है और उदारता की भावना पनपती है। इसके लगातार अभ्यास से किसी के प्रति द्वेष तथा ईर्ष्या नहीं होती। परोपकारी मनुष्य न केवल अपने बारे में सोचता है बल्कि दूसरों के सुख-दुख का ध्यान भी रखता है’ईश्वर ने सभी प्राणियों में सबसे योग्य मनुष्य को बनाया है और परोपकार का गुण ही मनुष्य को पशु से अलग करता है और पूजनीय बनाता है। परोपकार का सबसे बड़ा लाभ है- आत्म संतुष्टि और आत्मिकशांति, और यही सुख का सार है।
From: Jansatta
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