लगातार बिगड़ते धरती के पर्यावरण का सबसे बड़ा नुकसान इस रूप में सामने आया है कि दुर्लभ प्रजाति वाले जीव-जंतु और वनस्पतियां लुप्त होती जा रही हैं। जो बची हैं, उनके सामने अस्तित्व का खतरा है। ऐसा नहीं कि यह खतरा सिर्फ जमीन पर रहने वाले प्राणियों पर ही मंडरा रहा है, समुद्री जीवों और वहां की वनस्पतियां भी इस संकट से जूझ रही हैं। जाहिर है, ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती दुर्लभ प्रजाति वाले प्राणियों को बचाने की तो है ही, साथ ही उन प्रजातियों को भी संरक्षित करना जरूरी है जिन पर भविष्य में अस्तित्व का खतरा पैदा हो सकता है।
हालांकि धरती के जीव-जंतुओं की रक्षा के लिए पूरे विश्व में लंबे समय से वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम और जैव विविधता संरक्षण जैसे अभियान चल रहे हैं। ज्यादातर देशों ने भी अपने यहां इसी तरह के कार्यक्रम चला रखे हैं। लेकिन वन्यजीवों और जलीय जीवों की कई प्रजातियां जिस तेजी से खत्म हो रही हैं, उससे ऐसे कार्यक्रमों पर सवाल खड़े होने लगते हैं। जीव-जंतुओं और वनस्पतियों का महत्त्व धरती के पर्यावरण और जीवन-चक्र को संतुलित बनाए रखने के लिए तो आवश्यक है ही, यह इस लिहाज से भी काफी महत्त्वपूर्ण है कि धरती पर जीवन की उत्पत्ति का राज शायद कहीं इन्हीं में छिपा हो!
भारत के संदर्भ में देखें तो यहां की वन्यजीव संपदा भी मामूली नहीं है। भौगोलिक रूप से भारत की स्थिति जितनी विभिन्नताओं से युक्त है, उसी का परिणाम है कि यहां जितनी प्रजातियों के वन्यजीव और पेड़-पौधे पाए जाते हैं, उतने दुनिया के कम ही देशों में हैं। फिर भारत का वन क्षेत्र भी कम नहीं है। जाहिर है, वन संपदा के मामले में भी हम भाग्यशाली हैं। पर पिछले कुछ दशकों में इन सब पर किसी न किसी तरह से संकट के बादल छाते जा रहे हैं। इसलिए बड़ा सवाल यह है कि इन्हें बचाया कैसे जाए, ताकि आने वाले वक्त में हमारी धरती के जीव-जंतु और वनस्पतियां विलुप्ति के कगार पर न पहुंचने लगें। ऐसी ही ताजा चिंता असम से देखने को मिल रही है।
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में घास के मैदान नष्ट हो रहे हैं। इससे एक सींग वाले गैंडे, हाथियों और दूसरे जीवों के लिए मुश्किलें खड़ी होती जा रही हैं। इसे नए तरह का पर्यावरणीय संकटकहा जा सकता है। यह इलाकाऐसी खरपतवार से भरता जा रहा है जो घास के मैदानों को खत्म कर देती है। इससे वन्यजीवों के लिए चारे का संकट गहराने लगा है। अब कांजीरंगा अभायरण्य की देखरेख करने वाले अधिकारियों ने इन्हें खत्म करने की योजना बनाई है। हालांकि ऐसी समस्या प्रकृतिजन्य है, लेकिन इसका समाधान तुरंत होना चाहिए। वरना काजीरंगा की वन्यजीव संपदा पर इसका असर पड़ते देर नहीं लगेगी।
वनों और अभयारण्यों में ऐसे जहरीले पेड़-पौधे के निकल आने के कारण प्राकृतिक और पर्यावरणीय तो होते हैं, पर ऐसा नहीं कि इस तरह की समस्याओं से निजात न पाई सके। वन्यजीवों के संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर परियोजनाओं की कोई कमी नहीं होती। लेकिन इस दिशा में काम जिस गति से चलते हैं, उससे लगता है कि ऐसे सब काम सरकारें प्राथमिकता में शामिल नहीं करना चाहतीं। जहरीले पौधों की बारहमासी प्रजातियां सामने आ रही हैं। लेकिन समय से इनके निपटान का भी इंतजाम होना चाहिए था। काजीरंगा का यह मामला लगता है तब सामने आया जब हालात गंभीर होने लगे। वन प्रबंधन और वन्यजीव संरक्षण काफी ध्यान और काम मांगते हैं, जिनका हमारे यहां अभाव दिखता है।
From: Jansatta
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