Saturday, May 21, 2022

भारती के सपूत रासबिहारी बोस

आजादी की लड़ाई में बहुत सारे नेताओं का मानना था कि सशस्त्र क्रांति के जरिए ही अंग्रेजों से सत्ता वापस ली जा सकती है। रासबिहारी बोस उनमें प्रमुख थे। उनका जन्म बंगाल में बर्धमान जिले के सुबालदह गांव में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा चंदननगर में हुई, जहां उनके पिता विनोद बिहारी बोस नियुक्त थे। शुरू में उन्होंने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक हेड क्लर्क के रूप में काम किया।

उसी दौरान उनका संपर्क जतिन मुखर्जी की अगुआई वाले ‘युगांतर’ नामक क्रांतिकारी संगठन के अमरेंद्र चटर्जी से हुआ और वे बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ जुड़ गए। बाद में वे अरबिंदो घोष के राजनीतिक शिष्य रहे। यतींद्रनाथ बनर्जी यानी निरालंब स्वामी के माध्यम से संयुक्त प्रांत, (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और पंजाब के प्रमुख आर्यसमाजी क्रांतिकारियों के निकट आए।

दिल्ली में जार्ज पंचम के 12 दिसंबर, 1911 को होने वाले दिल्ली दरबार के बाद जब वायसराय लार्ड हार्डिंग की दिल्ली में सवारी निकाली, तो उस पर बम फेंकने की योजना बनाने में रासबिहारी की प्रमुख भूमिका रही थी। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर की योजना बनाई। फरवरी 1915 में अनेक भरोसेमंद क्रांतिकारियों की सेना में घुसपैठ कराने की कोशिश की गई।

फिर ‘युगांतर’ के कई नेताओं ने सोचा कि यूरोप में युद्ध होने के कारण अधिकतर सैनिक देश से बाहर गए हुए हैं, इसलिए अंग्रेजी सेना को आसानी से हराया जा सकता है, पर दुर्भाग्य से वह प्रयास भी विफल रहा और कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

ब्रिटिश खुफिया पुलिस ने रासबिहारी बोस को भी पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वे भाग कर जून 1915 में राजा पीएन टैगोर के छद्म नाम से जापान के शहर शंघाई पहुंच गए। वहां उन्होंने अंग्रेजी अध्यापन के साथ लेखक और पत्रकार के रूप में भी काम किया। ‘न्यू एशिया’ नाम से एक अखबार भी निकाला। उन्होंने तोक्यो में होटल खोल कर भारतीयों को संगठित किया तथा ‘रामायण’ का जापानी भाषा में अनुवाद किया।

1916 में जापान में ही रासबिहारी बोस ने प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री से विवाह कर लिया और 1923 में वहां की नागरिकता ले ली। जापानी अधिकारियों को भारतीय राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और देश की आजादी के आंदोलन को उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में भी रासबिहारी बोस की अहम भूमिका रही। उन्होंने 28 मार्च, 1942 को तोक्यो में एक सम्मेलन बुलाया, जिसमें ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ की स्थापना की गई और एक सेना बनाने का प्रस्ताव पेश किया गया।

22 जून, 1942 को रासबिहारी बोस ने बैंकाक में लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमंत्रित किया गया। आइएनए का गठन किया गया। बोस ने एक झंडे का भी चयन किया जिसे ‘आजाद’ नाम दिया गया। जापान द्वारा मलय और बर्मा के मोर्चे पर पकड़े गए भारतीय युद्धबंदियों को इंडियन नेशनल आर्मी (आइएनए) का सैनिक बनने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

हालांकि बाद में जापानी सैन्य कमान ने रासबिहारी बोस और जनरल मोहन सिंह को आइएनए के नेतृत्व से हटा दिया। फिर इसी ढांचे पर सुभाषचंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ के नाम से आइएनए का पुनर्गठन किया। 21 जनवरी, 1945 को रासबिहारी का निधन हो गया। उनके निधन से कुछ समय पहले जापान सरकार ने उन्हें ‘आर्डर आफ द राइजिंग सन’ सम्मान से अलंकृत किया था।



From: Jansatta

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