आत्माराम भाटी
अपनी 95 सालों की यात्रा यूरोप, रूस और मध्य पूर्व के देशों में करने के बाद शतरंज का महाकुंभ कहा जाने वाला विश्व शतरंज ओलम्पियाड अपने 44वें संस्करण के साथ पहली बार भारत में प्रवेश कर रहा है। इसका आयोजन शतरंज नगरी चेन्नई में 28 जुलाई से 10 अगस्त 2022 तक होगा। देखा जाए तो भारत ही नहीं एशिया में इसका आयोजन 30 साल बाद हो रहा है।
1924 में पेरिस में पहली बार औपचारिक शुरुआत व 1927 में लंदन में आधिकारिक रूप से आयोजन का आगाज करने वाले इस शतरंज महाकुंभ के 44वें संस्करण का आयोजन पहले रूस में होना था। लेकिन रूस के अपने पड़ोसी देश यूक्रेन पर आक्रमण के कारण शतरंज की सर्वोच्च संस्था फिडे ने रूस से न केवल शतरंज ओलम्पियाड बल्कि दिव्यांगों के लिए पहली बार आयोजित विश्व शतरंज ओलम्पियाड व अपनी 93वीं फिडे कांग्रेस की मेजबानी छीनकर उसे करारा झटका दिया।
फिडे के अध्यक्ष आकेर्डी ड्वोर्कोविच के पास रूस से मेजबानी छीनने के बाद भारत ही अच्छा विकल्प था। इसी कारण फिडे अध्यक्ष ने विश्व स्तर पर लगातार भारतीय शतरंज खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन के साथ शतरंज के बादशाह विश्वनाथन आंनद व अखिल भारतीय शतरंज महासंघ के अध्यक्ष डा संजय कपूर के भारत में इस आयोजन को करवाने की इच्छा का सम्मान किया।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत इस आयोजन का इसलिए भी मजबूत दावेदार था क्योंकि उसने 2020 में वर्चुअल ओलम्पियाड को अपने शानदार शातिरों के दम पर रूस के साथ पहली बार इस खिताब को अपनी झोली में डालने में कामयाबी पाई थी। इसके साथ ही, नए युवा खिलाड़ी दिन-प्रतिदिन भारत से इस चौसठ खाने की चौसर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धमक जमा कर कम उम्र में अपने दिमागी कौशल से विरोधियों को धराशायी कर ग्रांड मास्टर बनने का इतिहास बना रहे हैं।
साथ ही पुरुष वर्ग में 2670 की औसत इएलओ रेटिंग व महिला वर्ग में 2405 की औसत रेटिंग में दस-दस खिलाड़ियों की उपस्थति दर्ज करवा कर आज पूरी दुनिया में पुरुष वर्ग में रूस, अमेरिका व चीन बाद शतरंज खेलने वाले 158 देशों में चौथी पायदान पर तथा महिला वर्ग में 156 देशों में चीन व रूस के बाद तीसरी पायदान पर है। भारत की इन उपलब्धियों को देखते हुए फिडे के लिए आपात स्थितियों में इससे बढ़िया मेजबान मिलना मुश्किल ही था।
भारत का विश्व स्तर पर इस खेल में पिछली सदी के आठवें दशक तक बतौर बेहतरीन खिलाड़ियों के मायने ज्यादा नहीं थे। क्योंकि कोई ऐसा खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बड़ी जीत दर्ज नहीं कर पाया था। लेकिन 1980 के बाद कुछ खिलाड़ियों ने एशिया स्तर पर जीत दर्ज कर विश्व स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने लगे। महिला में रोहिणी खंडेलकर और उसके बाद 1987 में विश्व जूनियर चैम्पियनशिप को जीत कर विश्वनाथन आनंद ने इस खेल में देश को विश्वस्तर पर पहचान दिलाई।
आनंद ने 2007 से 2013 तक विश्व चैम्पियनशिप में अपना दबदबा बनाये रखा। पांच बार विश्व खिताब अपने नाम किया। बस आनंद ही इस देश में युवाओं के दिलों में शतरंज खेल की अलख जगाने में कामयाब रहे। जिसका प्रतिफल यह है कि आज भारत के पास 73 ग्रांड मास्टर हैं जिनमें 18 महिलाएं हैं। 125 इंटरनेशनल मास्टर जिनमें 42 महिलाएं हैं। यही नहीं रेटेड खिलाड़ियों की संख्या 33000 से ज्यादा है।
यह आनंद द्वारा लगाए गए शतरंज के उस वृक्ष का कमाल है कि क्रिकेट के दीवानों के इस देश में शतरंज को चाहने वाले युवाओं की एक लंबी कतार है। चेन्नई में हो रहा शतरंज का यह महाकुंभ देश में 2013 में हुई विश्व शतरंज चैम्पियनशिप के बाद चौसठ खानों वाले इस खेल दूसरा सबसे बड़ा आयोजन है। शतरंज के इस महाकुंभ में 180 से ज्यादा देशों के 2000 से ज्यादा शातिर अपनी रहस्यमयी चालों के साथ उतरेंगे। अपनी मेजबानी का फायदा उठाने में भारतीय शातिर भी पीछे नहीं रहेंगे। क्योंकि भारत अभी तक जो 43 आयोजन (दो सालों में हुए वर्चुअल आयोजन को छोड़ कर) हुए हैं उसमें केवल एक बार ही कांस्य पदक जीता है। एक स्वर्ण व एक कांस्य पदक 2020 व 2021 में आनलाइन आयोजन में जीता है।
विश्व शतरंज ओलम्पियाड में सबसे ज्यादा दबदबा पूर्व सोवियत रूस का रहा है जिसने 18 स्वर्ण जीते। दूसरे नंबर पर रूस 8 स्वर्ण, तीसरे स्थान पर 6 स्वर्ण के साथ अमेरिका है तथा चौथे व पांचवें स्थान पर 3-3 स्वर्ण के साथ हंगरी व आर्मेनिया है। भारत 1 स्वर्ण 2 कांस्य के साथ ग्यारहवें स्थान पर है।
इसमें दो राय नहीं कि देश में दो दशक में शतरंज खेल में हजारों की संख्या में युवा न केवल जुडेÞ, बल्कि उपलब्धियां भी प्राप्त कर रहे हैं।
लेकिन इसमें सबसे बड़ी कमी नजर आ रही है वह यह कि इस खेल में बहुत ही कम प्रदेशों के बच्चे आगे आ रहे हैं। ज्यादातर तो दक्षिणी व पश्चिम राज्यों में ही इस खेल से युवा जुड़ रहे हैं और बड़ी उपलब्धियां पा रहे हैं। इसका प्रमाण यह है कि अभी तक देश में जो 73 ग्रांड मास्टर हैं, उनमें सबसे ज्यादा दक्षिण से है- तमिलनाडु से 26, आंध ्रप्रदेश से व तेलंगाना से 4-4, केरल व कर्नाटक से 3-3 यानी आधे से ज्यादा 39 दक्षिण से है। इसके बाद महाराष्ट्र से 10 व पश्चिमी बंगाल से 9 है। ओड़ीशा से 2 हैं। जबकि उत्तर-पश्चिमी भारत से दिल्ली 6, गुजरात, हरियाणा व राजस्थान से 1-1 कुल 9 ही हैं।
ये आंकड़े बताते हैं कि शतरंज का खेल क्रिकेट व अन्य प्रमुख खेलों की तरह पूरे देश के युवाओं को आकर्षित करने में अभी तक कामयाब नहीं हो पाया है। ऐसे में देश में जो जुलाई में शतरंज का महाकुंभ हो रहा है उसकी सार्थकता तभी है जब भारतीय शतरंज महासंघ इस आयोजन के प्रति पूरे देश के युवाओं को प्रचार-प्रसार से आकर्षित करे ताकि देश के हर हिस्से से हमें ग्रांड मास्टर मिल सके जो पूरी दुनिया में अपनी दिमागी ताकत के दम पर शतरंज के जन्मदाता देश का नाम रोशन कर सकें।
From: Jansatta
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