Thursday, March 17, 2022

ऐसी तो न थी होली

आशुतोष कुमार

होली में जीवन का राग समाहित है। अब तक होली को हम जैसा भी देखते रहे हों, लेकिन अब होली उदास है। उमंग और उत्साह गायब है। शायद इसे ‘नए जमाने’ की नजर लग गई। ‘नए जमाने’ मतलब, नई सोच और नई जीवन शैली। जब जीवन शैली बदल जाती है, तो पर्व-त्योहारों के मानने के तौर-तरीके भी बदल जाते हैं। हालांकि सिर्फ होली की बात नहीं है, बल्कि हर पर्व-त्योहार के साथ भी कमोबेश ऐसा ही है।

चूंकि होली का लोक-जीवन से गहरा संबंध है, इसमें रिश्तों की आत्मीयता और उसकी गर्माहट के साथ लोक-संस्कृति इसमें चटक रंग दिखते थे, इसलिए होली के रंग का फीका पड़ना अधिक सालता है। अब होली में न तो भाईचारे और आपसी मिल्लत का राग रहा और न ही लोक-संस्कृति का रंग। एक समय होली का त्योहार आते ही ढोलक की थाप और मंजीरों पर चारों ओर फाग गीत गुंजायमान होने लगते थे। वासंती बयार के साथ फाग का राग घुल कर भावोत्पादकता के चरम पर होता था। ऐसा महसूस होता था जैसे पूरी सृष्टि नाच रही हो। लेकिन आधुनिकता ने इसे अपना ग्रास बना लिया। शहर की बात तो दूर, अब ग्रामीण परिवेश में भी फाग का राग के साथ ढोलक की थाप सुनाई नहीं पड़ती।

एक समय था, जब किसी के दालान पर फगुआ की महफिल सजती थी। उस महफिल में सभी तबके के लोग शरीक होते। वहां शरबत-पानी और रंग-गुलाल का पुख्ता इंतजाम होता था। कोई ‘होरी’ गाने वाले सधी आवाज में टेर लगाता, फिर उसकी टेर पकड़ कर कोई और सहारा देता। फिर उसे तीव्रता के साथ विभिन्न स्वरों में देर तक दुहराया जाता। फाग के समवेत स्वर में लोगों की अलग-अलग भंगिमाएं भी होतीं।

बच्चों के लिए यह विशेष आकर्षण होता। कोई पालथी मारकर दोनों घुटनों पर ढोलक की तरह ताल देता, तो किसी कि आंखें विचित्र हरकतें करतीं। कोई अपने लंबे बालों को लय के अनुसार झटके देते, तो कोई अपने मुंह की आकृति ऐसा बना लेता, जैसे किसी ने करेला का जूस पिला दिया हो! जब राग का आवेग चरम पर होता, तब आधे से अधिक लोग घुटनों पर खड़े हो जाते। फिजां में रस घोलती झालों की समवेत ध्वनि। ढोलक पर ताबड़तोड़ थाप से लगता कि ढोलक अब फटा कि तब। भाईचारे और आपसी सद्भाव का अतुलित-अद्भुत नजारा।

लेकिन अब होली को शहरीपन की नजर लग गई। अब ‘होली खेले रघुबीरा अवध में, होले खेले रघुबीरा…’, और ‘आज बिरज में होरी रे रसिया…’ जैसे कर्णप्रिय होली गीत सुनाई नहीं देते। अब इन पारंपरिक गीतों की जगह भौंडे और अश्लील गानों ने अपना स्थान बना लिया है। होली के महीने भर पहले से ही तिपहिया और बसों में होली के नाम पर ऊंची आवाज में अश्लील गाने बजने शुरू हो जाते हैं। इससे महिलाओं के लिए कहीं आना-जाना भी मुश्किल हो जाता है।

होली के दिन भी अलग-अलग टोलों में लोग ताश के पत्ते फेंटते दिखते हैं। पूरे गांव की होली पहले टोलों, फिर परिवार और अब पति-पत्नी और बच्चे तक सिमट कर रह गई है। शरारती युवाओं की टोली अब जल्दी चिढ़ने वाले किसी बुजुर्ग को खोज कर उन्हें गहरे रंगों से सराबोर नहीं करती। उनके गुस्से को हंसी-ठहाकों में तब्दील नहीं करते। शहर ही नहीं, गांव का युवा वर्ग भी अब वाट्सऐप और यूट्यूब पर मशगूल है। बुजुर्ग अब बेकार की वस्तु बन गए। अब बात-बात पर लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। अब न पहले जैसी अल्हड़ मिजाजी रही और न पहले की तरह सहनशीलता। पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में भी पहले जैसी आत्मीयता नहीं रही।

यह सब अचानक नहीं हुआ। आधुनिकता की दौड़ में हम इतने मगन हो गए कि पता ही नहीं चला कि हम अपनी संस्कृति से कटते जा रहे हैं। पर्व-त्योहारों में हर्ष के साथ शरीक होना अब कुलीनता को धूमिल करने लगा है। जरा देखिए कि गांव या शहरों में ‘अगजा जलने’ में गांव या शहर के तथाकथित कितने संभ्रांत लोग शामिल होते हैं। एक समय था जब गांव में बच्चों की टोली, जिसमें हर वर्ग, हर समाज के बच्चे शामिल होते थे, घर-घर जाकर समवेत स्वर में ‘हे जजमानी, तोहे सोना के किबाड़ी, एक गंडा गोइठा द’ गाते हुए गोइठा (उपले) मांगते थे।

गांवों में भी अब यह दृश्य नहीं दिखता और न ही बच्चों का यह समवेत गान सुनाई पड़ता है, क्योंकि आधुनिकता के जंजीरों में जकड़ा मन अब इसकी इजाजत नहीं देता। औपचारिकता निभाने के लिए लोग होली में गले तो मिलते हैं, लेकिन मन नहीं मिलता। और अगर किसी त्योहार में मन नहीं मिल रहा हो तो वह त्योहार कैसा? कौन-सा त्योहार ऐसा होना चाहिए, जो लोगों और समाज के बीच आपसी सद्भाव के संदेश नहीं देता हो? कौन ऐसा व्यक्ति होगा जो सद्भाव से रहित अकेलेपन में डूबा कोई त्योहार माना चाहेगा? लेकिन अब बदलते वक्त के साथ ऐसा हो रहा है या फिर ऐसा होने के हालात बन रहे हैं। हमारी होली ऐसी तो न थी!



From: Jansatta

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