Tuesday, March 15, 2022

हौसले का हासिल

मोनिका भाम्भू कलाना

अक्सर मैं क्रिकेट मैच घर में मौजूद टीवी पर देखती हूं। मेरे भीतर यह दिलचस्पी बचपन में तो थी, अब दो साल पहले तक मैं मैच को केवल तभी तक देखती, जब तक भारतीय बल्लेबाज रन बना रहे होते। भारतीय गेंदबाजी को तो मैंने शायद ही कभी ठीक से देखा हो। इस तरह देखना केवल जीत की उम्मीद से होता। जैसे ही जीत भारतीय टीम के हाथ से निकलती दिखने लगती तो टीवी बंद हो जाता। फिर धीरे-धीरे मैच देखने में रुचि कम हुई और पढ़ाई-लिखाई के साथ भविष्य और आत्मनिर्भरता की फिक्र और उससे जुड़ी समस्याओं ने इस तरफ से ध्यान हटा दिया। फिर समय के साथ परिस्थितियों ने सिखाया कि भले ही हमारी नीयत कितनी ही साफ हो, हमने मेहनत भरपूर की हो, लेकिन सब कुछ हमारी योजना या हमारे सोचे हुए के अनुसार हो या परिणाम हमारे ही पक्ष में रहे, यह कतई जरूरी नहीं।

कहने का आशय यह है कि अपने काम पूरे करने के बाद उसके नतीजों की संभावना के लिए ही नहीं, हर आशंका के लिए भी खुद को तैयार करने की जरूरत है। अब मुझे लगता है कि जिस अनुपात में आशंका एवं दुर्घटनाओं के लिए हम खुद को मानसिक रूप से तैयार कर पाएंगे, उसी मुताबिक चीजों को सहज होकर देखने में सक्षम होंगे। ये सबके साथ घटित होती हैं। अब क्रिकेट मैच देखना मुझे कोई खास पसंद नहीं, इसलिए जब इसे देखने की नौबत आ ही जाती है तो मैं इस खेल को बगैर किसी पूर्वाग्रह और उम्मीद के देखती हूं।

खेल हमें धैर्य सिखाता है। यह बिल्कुल जीवन की तरह है। यह सिखाता है कि व्यक्ति सदैव अनिश्चितता में जीने को बाध्य है। खेल हमें बताता है कि बहुत बार शुरुआत से ही परिस्थितियां हमारे प्रतिकूल हो जाती हैं, तब भी हमें अंत तक डटे रहना पड़ता है, क्योंकि हम संघर्ष से बाहर होने का विकल्प नहीं चुन सकते हैं। संघर्ष से बाहर होने का सीधा मतलब हार कबूल करना होता है। और कोई भी खिलाड़ी जब मैदान में उतरता है, तब वह कभी नहीं सोचता कि उसकी हार हो। इसके अलावा, क्षमता भर संघर्ष के बाद हार भी मिले तो उसकी भी एक गरिमा होती है।

दरअसल, खेल हमें समझाता है कि कई बार धैर्य से बड़ा कुछ नहीं होता। जब लगने लगता है कि संघर्ष में पार पाना एक जटिल चुनौती है तब हमें बहुत कुछ करने से कहीं अधिक उस समय के गुजर जाने का इंतजार करना होता है। इस इंतजार में भी अपने संघर्ष के हौसले को कायम रखना होता है। इस बीच होता यह है कि अगर तब तक हमने हार नहीं मान ली है, तो आने वाले किसी भी पल में बाजी पलटने की संभावना अंत तक बनी रहती है। सबसे खास बात यह है कि खेल हमें वह समर्पण और उस भावना को सम्मान देना सिखाता है जो परिणाम से कहीं अधिक उस प्रक्रिया में निहित होता है, जिसमें हमें ज्यादा समय देना पड़ता है।

मैं अब खेल को इसी दृष्टिकोण से देखती हूं। मैं मैच का इंतजार तब करती हूं, जब किन्हीं वजहों से बहुत असहाय महसूस करती हूं या जब कोशिश करने के बावजूद बिल्कुल भी नहीं पढ़ पाती। अब मैं केवल भारतीय टीमों की पारी ही नहीं, विपक्षी टीमों की पारी भी देखती हूं और महसूस करती हूं उस भावना को कि जब कोई एक पक्ष दूसरे पर हावी हो जाता है, तब आखिर खिलाड़ियों को कैसा लगता होगा! वे किस सोच और मन:स्थिति के साथ मैदान में डटे रहते हैं! मुझे उस गेंदबाज से वाकई बहुत प्रेरणा मिलती है जो अपनी गेंदों को बल्लेबाजों के हाथो सीमा रेखा के पार पहुंचाए जाने के बावजूद विकेट गिराने के लिए प्रयासरत रहता है। ऐसे तमाम मौके आए हैं, जब किसी गेंदबाज की गेंदों पर रन बनाते हुए विपक्षी टीम के खिलाड़ी जीत के दरवाजे पर पहुंच गए, लेकिन आखिरी गेंद ने उन्हें जीत को थामने से रोक दिया। इसी तरह किसी आखिरी गेंद पर जीत के लिए जरूरी रन बनाने वाले भी उदाहरण मौजूद हैं।

अब मुझे फिर यह खेल बहुत रोचक लगने लगा है। मैं इसे महसूस करती हूं और कई मौकों पर अपने हालात से जोड़ पाती हूं। अक्सर मैं खेल के उतार-चढ़ाव को भावनात्मक स्तर पर देखती हूं और पाती हूं कि लड़ते रहना बड़ी बात है खेल में भी और जिंदगी में भी। वक्त भले कितना ही बुरा हो, स्थितियां कितनी ही प्रतिकूल हों, एक दिन सब बीत जाना है। शर्त यही है कि हम कोशिश न छोड़ें। यानी कि अंतिम क्षण तक हम लगे रहें। सच यह है कि मैदान में अपने विपक्षी से टकराने के प्रति यह लगन, ऐसा जज्बा और अपनी क्षमता पर पूर्ण विश्वास ही मनुष्य को सफलता-विफलता से परे जिंदगी रूपी इस खेल का आनंद लेना सिखाता है। यह आनंद जीवन के किसी बड़े मूल्य से कम भी नहीं है।



From: Jansatta

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