Saturday, March 26, 2022

काल का डमरु नाद

कुछ सोचता हुआ पगडंडी पर लंबे-लंबे डग भरता हुआ चला जा रहा था। सामने, खेतों के पार, शाम का सूरज कुछ ठिठका हुआ खड़ा था। शायद फैसला नहीं कर पा रहा था कि अभी डूब जाऊं या फिर एक पल हरे-भरे खेतों को और निहार लूं। सहसा कोई मेरे साथ कदम से कदम मिला कर चलने लगा। कहां जा रहे हैं आप? उसने सरल भाव से पूछा। पता नहीं, मैंने अनमना-सा उतर उछाल दिया। अरे, चले जा रहे हैं और पता नहीं कि कहां जा रहे हैं! कैसे आदमी हैं आप?

मैंने उसकी तरफ देखा। वह मुस्करा रही थी। बस, चला जा रहा हूं। देखता हूं, कहां पहुंचता हूं। पहुंच के देखेंगे? उसने शरारती अंदाज में पूछा। और क्या। पहले से क्या तय करना, समय जहां पंहुचा देगा वहीं पहुंच जाएंगे। अरे वाह! इसका मतलब आप अपने काल से बंधे हुए हैं।

हां, काल, समय या वक्त कुछ भी कहें, हम सब उसी से तो बंधे हैं। काल हमारे बस में सब कुछ कर सकता है और साथ में एकदम बेबस भी कर सकता है। काल सर्वोपरि है, मैंने कहा। वह कुछ सोच में पड़ गई। अपने दुपट्टे का एक छोर चबाने लगी। मैंने अपनी बात जारी रखी। हमें काल की प्रभुसत्ता माननी ही है। हम सब काल के हाथों में मात्र कठपुतली हैं, जिन्हें वह अपनी इच्छानुसार नचाता रहता है।

उसने दुपट्टा मुंह से निकाला और तपाक से बोली, क्या हम काल का कुछ भी प्रतिकार नहीं कर सकते हैं? यदि हम वास्तव में ऐसा मान लें, तब तो हमारी विद्या, बुद्धि, कर्मठता, परिश्रम सब व्यर्थ हैं। यदि कालवश मृत्यु होनी ही है, तो रोगी का उपचार क्यों किया जाए?

मैं उसकी बात पर हंसने लगा। यह सब अलग चीजें हैं। सबका अपना निर्धारित समय होता है और हम काल का ग्रास बन जाते हैं। वह मुझसे दो कदम आगे बढ़ी और रुक गई। मेरी तरफ मुखातिब होकर बोली, आपने महाभारत पढ़ी है? कुछ-कुछ, पूरी नहीं पढ़ी। मैंने थोड़ा शर्मिंदा होते हुए कहा।

मैं आपको महाभारत से एक कथा सुनाती हूं। पूजनी नाम की एक चिड़िया राजा ब्रह्मदत्त के महल में रहती थी। एक बार राजकुमार ने उसके बच्चों को मार डाला। चिड़िया दुखी होकर महल छोड़ कर जाने लगी। राजा उसके पास दौड़ते हुए गए और उसे रोकते हुए बोले कि मानव काल के प्रभाव से सब क्रियाएं करता है। इसमें कोई किसी का अपराध नहीं करता है।

पूजनी ने उतर दिया- राजन, अगर आप काल को ही सब क्रियाओं का कारण मानते हैं तो किसी को किसी से वैर-भाव नहीं होना चाहिए। अगर कालवश ही जन्म, मृत्यु, सुख-दुख, उन्नति-अवनति होती है, तो पूर्वकाल में देवता और असुरों में परस्पर युद्ध और वध क्यों हुए थे? इसी तरह अगर काल ही सभी को पका रहा है तो कर्म करने वालों के लिए विधि निषेध रूपी धर्म के पालन का नियम क्यों बनाया गया है?

मैं उसकी बात ध्यान से सुनने लगा। अच्छा उपदेश देती हो, मैंने मुस्करा कर टिप्पणी की। वह खिलखिला कर हंस पड़ी और बोली, अभी महाभारत की कथा खत्म नहीं हुई है। महर्षि व्यास शुकदेव को उपदेश देते हुए कहते हैं- जो संकट के समय में धैर्य धारण कर सकता है, बुद्धि द्वारा समस्या का हल सोच सकता है, वही काल से अपनी रक्षा कर सकता है।

व्यास कहते हैं- बुद्धिमान और धीर पुरुष बुद्धि रूपी नौका द्वारा काल रूपी नदी को पार कर सकते हैं। और बताओ, मैंने उत्सुक होकर कहा, क्या बुद्धि द्वारा सभी लोग काल से अपनी सुरक्षा कर सकते हैं?

नहीं, वह एक ऊंची मेढ़ पर बैठ गई। मैं भी साथ में बैठ गया। अविवेकी जन काल प्रवाह में बह जाते हैं, क्योंकि वे कामनाओं में आसक्त और चंचल बुद्धि वाले होते हैं। व्यास जी कहते हैं कि काल रूपी नदी में काम रूपी ग्राह से पीड़ित होने के कारण उनके लिए ज्ञान भी नौका नहीं बन पाता है। पर यह निश्चित है कि यदि काल का प्रतिकार करना अभीष्ट है, तो वह केवल बुद्धि बल द्वारा ही संभव है। कैसे? मैंने कहा।

वह एक बार फिर खूब खिलखिला कर हंसी। बोली, काल निराकार है, इसे इंद्रियों से नहीं, बल्कि बुद्धि से अनुभव किया जाता है। महर्षि व्यास कहते हैं- कालतत्त्व बुद्धि रूपी गुफा में स्थित है, अर्थात काल का ज्ञान बुद्धि सापेक्ष है। यदि किसी की बुद्धि ठीक न हो, तो उसे काल का बोध नहीं होता है।

एक पागल व्यक्ति को काल अवधि का एहसास ठीक तरह से नहीं होता है। पर बुद्धिमान जानता है कि जिस तरह भौतिक जगत में अंतरिक्ष में काल की गति धीमी है और पृथ्वी पर तेज है, उसी प्रकार शरीर में भी ऐसे स्थान हैं, जहां मन एकाग्र करने से काल गति का अनुभव नहीं होता है, क्योंकि शरीर के पांच तत्त्वों में आकाश अथवा अंतरिक्ष भी एक तत्त्व है।

शिवसहिंता में कहा गया है कि जब योगी विशुद्ध चक्र पर ध्यान केंद्रित करता है, तो काल पर विजय पा लेता है। उसने अपनी बात खत्म की और उठ खड़ी हुई। एक मिनट रुको, मैंने हड़बड़ाते हुए कहा, यदि काल कर्मफल देने वाला तथा जगत की उत्पत्ति और संहार करने वाला तत्त्व है, तो फिर ब्रह्मांड की सर्वत्र शक्ति पर ब्रह्म क्या है? उसे सब गतिविधियों का नियामक कैसे माना जा सकता है?

उसने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया, कुछ विद्वान कहते हैं कि यह सब कालसंज्ञक ब्रह्म है। यह कालरूप ब्रह्म अनंत जल से परिपूर्ण महासागर के समान गंभीर, अनादि और अनंत है। उसे क्षर और अक्षर रूप कहा गया है। यह कालब्रह्म खुद निराकार होते हुए भी समस्त प्राणियों के भीतर जीव का प्रवेश कराता है। कालज्ञान ब्रह्मज्ञान है।

मैं अवाक, उसकी ओर ताक रहा था। काल में ब्रह्म बिराजमान है और ब्रह्म में काल, उसने कहा, दोनों निराकार हैं, जिनका अनुभव इंद्रियों के माध्यम से नहीं किया जा सकता है। वह केवल बुद्धि-अनुभव द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं। देखिए न, आपने जब बुद्धि का उपयोग किया और प्रश्न पूछे तो हम कहां से चले थे और कहां पहुंच गए हैं। सफर व्यर्थ नहीं गया। इसमें हमने कुछ पाया ही। ठीक कह रही हो, मैंने स्वीकार किया। अच्छा, मैं चलती हूं। हम पहुंच गए हैं। हां, जाओ।

वह तेजी से आगे बढ़ गई। अरे सुनो, मैंने पीछे से पुकारा, तुम्हारा नाम क्या है? और दुबारा कब मिलोगी? मेरा नाम बुद्धि है। मैं तो हमेशा आपके साथ रहती हूं, पर क्या करूं, आप मुझसे कभी बात नहीं करते हैं। उसने अल्हड़ उलाहना दिया और गोधूलि में गायब हो गई।



From: Jansatta

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