आधुनिकता का उपयोग और ऐशो-आराम की जिंदगी आजकल लोगों की मानसिकता बन गई है। नैसर्गिक जीवन की अवहेलना कर आज जिस रास्ते लोग जा रहे हैं, उसका एकमात्र मकसद रुपया-पैसा है। चाहे इसके बदले व्यक्ति कितने भी हीनकर्म क्यों न करे! प्रकृति में स्वच्छंद विचरण करने वाले जीवों की तस्करी का पहलू इससे ही जुड़ा हुआ है। इसमें लिप्त अपराधी आए दिन गिरफ्त में आ रहे हैं। इस पर कड़ी कानूनी कार्रवाई जरूरी है, तभी हमारी वन्य प्राणी संपदा सुरक्षित रह सकेगी।
अक्सर दुर्लभ जीवों की तस्करी के समाचार आते हैं। जमीन पर रहने वाले से लेकर उड़ने, जंगलों में रहने वाले और अन्य प्रकार के दुर्लभ जीव-जंतु आज आदमी की वक्र-दृष्टि के शिकार हैं। तस्कर अक्सर इन्हें पकड़ कर बेच देते हैं जो अत्यंत उपयोगी होने के बावजूद या तो भक्षण या उनकी खाल, अंग आदि घरों में टांगने के शौक की भेंट चढ़ जाते हैं।
लोग लालच में उन्हें क्रूर हत्यारों के हाथ बेच देते हैं, जो इससे बड़ी रकम कमाते हैं। निष्कर्ष यही निकलता है कि व्यक्ति अपना शौक पूरा करने के लिए इन जीवों की तस्करी का सहारा लेता है। परिश्रम की सूखी रोटी ही वास्तव में पेट को सुकून देती है। अगर इस बात को कुछ लोग समझ लें तो प्रकृति में विचरण करने वाले जीव स्वच्छंद और सुरक्षित रह सकेंगे।
- अमृतलाल मारू ‘रवि’, धार, मप्र
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