रूस-यूक्रेन का युद्ध भले दो देशों के बीच होता दिख रहा हो, पर इसकी मार किसी न किसी रूप में पूरी दुनिया को झेलनी पड़ेगी। संकट सिर्फ यही नहीं है कि हमले में निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं, लाखों लोग बेघर हो रहे हैं, शरणार्थी बन कर दूसरे देशों में जा रहे हैं और यूक्रेन में भारी तबाही हो गई है, बल्कि इसका असर अमेरिका, यूरोप से लेकर चीन तक पर पड़े बिना नहीं रहने वाला। डर यह है कि रूस-यूक्रेन की यह जंग दुनिया के ज्यादातर देशों की अर्थव्यवस्था को फिर से चौपट न कर दे।
पिछले कुछ दिनों से इसका असर दिखने भी लगा है। चीन, जापान से लेकर भारत और यूरोप-अमेरिका तक के शेयर बाजारों में मची उथल-पुथल इस बात का संकेत दे रही है। संकट ज्यादा गंभीर इसलिए भी है कि पिछले दो साल में कोरोना महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को तबाह कर डाला है। कुछ ही देश हैं जो अपनी अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौट आने का दावा कर रहे हैं। जबकि ज्यादातर देश तो आर्थिक संकट और मंद वृद्धि दर से जूझ ही रहे हैं।
गौरतलब है कि महामारी से उपजे संकट से उबरने के लिए सभी देशों को बड़े उठाने पड़े। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए प्रोत्साहन पैकेज भी जारी किए। भारी-भरकम रकम अर्थतंत्र में डाली जा रही है। लेकिन अभी भी विकास दर कम रहने का जोखिम बना हुआ है। फिर, बढ़ती बेरोजगारी, ऊंची महंगाई दर, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, बाजारों में मांग की कमी जैसे संकट तो बने ही हुए हैं। ऐसे में अगर दुनिया के बड़े देश जंग में कूदने लगें और सख्त आर्थिक प्रतिंबधों जैसी स्थितियां बनने लगें तो हालात बिगड़ने लाजिमी हैं।
जिन देशों के यूक्रेन और रूस के साथ कारोबारी रिश्ते हैं, उनके लिए और भी मुश्किलें खड़ी होंगी। वैश्विक व्यापार में हर देश एक दूसरे पर निर्भर रहता है। जाहिर है, ऐसे में रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगने से उन देशों के कारोबार भी प्रभावित होंगे जिनके साथ उसके साथ द्विपक्षीय समझौते हैं। भारत ही यूरोपीय देशों के साथ कई तरह के सामान का निर्यात और आयात करता है। अगर कुछ समय के लिए भी व्यापार में बाधा आ जाती है तो स्थानीय पर इसका असर पड़ते देर नहीं लगने वाली।
रूस-यूक्रेन जंग का पहला बड़ा असर तो कच्चा तेल महंगा होने के रूप में सामने आ चुका है। कच्चे तेल के दाम किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर सबसे पहले और तेजी से असर डालते हैं। गौरतलब है कि यूरोपीय संघ के देशों को गैस और तेल सबसे ज्यादा रूस ही बेचता है। ऐसे में अगर रूस पर पाबंदियां लंबे समय तक रह गर्इं तो उसकी तो हालत बिगड़ेगी ही, उन देशों को भी भारी मुश्किलें झेलनी पड़ेंगी जो उससे ईंधन खरीदते हैं। कच्चे तेल के बढ़ते दाम महंगाई बढ़ाने में आग में घी काम करते हैं। इससे जीवन जीने की लागत बढ़ती जाती है।
गौरतलब है कि यूरोप के देश पहले से ही भयानक आर्थिक संकट में हैं। यानी युद्ध की वजह से जो हालात पैदा हो रहे हैं, वे हर देश के लिए चुनौतीपूर्ण हैं। फिर, पिछले दो साल में ज्यादातर देशों में गरीबी बढ़ी है, बेरोजगारी भी बढ़ रही है और लोगों की आय में भारी गिरावट आई है। इस वक्त सरकारों के सामने बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को और गड्ढे में जाने से बचाने की है। ऐसे में रूस-यूक्रेन संकट लंबा खिंच गया तो दुनिया एक और नए जंजाल में फंस जाएगी।
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From: Jansatta
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