Sunday, February 20, 2022

सवालों में उलझा परिसीमन

चतर सिंह

जम्मू-कश्मीर के लिए अनुच्छेद 370 के अस्तित्व को इतिहास बना देने के फैसले के बाद इस संवेदनशील सूबे को देश की मुख्यधारा से जोड़ने और वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए ठोस जमीन तैयार करने की तैयारी कई स्तरों पर हो रही है। इनमें राज्य में निर्वाचन क्षेत्रों के नए परिसीमन का प्रस्ताव इन दिनों खासा चर्चा में है। क्या है यह प्रस्ताव, क्यों उठ रहे हैं इस पर सवाल, इसी पर विशेष।

एक नवस्वतंत्र राष्ट्र को बुलंदियों तक ले जाने के इरादे से हमारे संविधान निर्माताओं ने लोकतांत्रिक राह चुनी और एक ऐसे लचीले संविधान का निर्माण किया, जो बदलते वक्त व परिस्थितियों के अनुरूप देश की उम्मीदों पर खरा उतर सके। इस क्रम में ऐसी स्वतंत्र लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण किया गया, जो निष्पक्ष रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान करती रहें।

इसी दरकार के साथ देश में निष्पक्ष चुनावों को संपन्न कराने के लिए निर्वाचन आयोग का गठन किया गया, तो जनसंख्या में होने वाले परिवर्तन के मद्देनजर विभिन्न लोकसभा व विधानसभाओं की सीमाओं के निर्धारण के लिए विभिन्न परिसीमन आयोगों के गठन का प्रावधान भी किया गया। संविधान के अनुच्छेद 82 के मुताबिक सरकार हर दशक (10 वर्ष) के बाद परिसीमन आयोग का गठन कर सकती है। इसके तहत जनसंख्या के आधार पर विभिन्न विधानसभा व लोकसभा क्षेत्रों का निर्धारण होता है। अब तक भारत में 1952, 1963, 1973 व 2002 में परिसीमन आयोगों का गठन किया जा चुका है।

आयोग का कामकाज

जम्मू-कश्मीर के परिसीमन के लिए मार्च 2020 में जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में गठित आयोग के कार्यकलापों से यह प्रतीत हो रहा है कि यह आयोग कानूनी व संवैधानिक नियमों के दायरे से बाहर जाकर काम कर रहा है। संवैधानिक प्रावधानों में यह स्पष्ट किया गया है कि देश के किसी भी राज्य में लोकसभा व विधानसभा की सीटों की सीमाओं के निर्धारण का यदि कोई एकमात्र आधार हो सकता है तो वह जनसंख्या ही है। जनसंख्या के आधार पर ही सीटों की संख्या तय होगी। लेकिन जम्मू-कश्मीर के मामले में सीटों को बढ़ाने के लिए जिस किस्म की दलीलें खुद अयोग की ओर से दी गई हैं, उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।

सीटों का बंटवारा

जम्मू-कश्मीर में पिछला परिसीमन आयोग जस्टिस जीडी शर्मा (सेवानिवृत्त) के नेतृत्व में बनाया गया था। आयोग ने 1981 की जनगणना के अनुसार सीटों का निर्धारण किया। 1981 की जनगणना के अनुसार जम्मू-कश्मीर की जनसंख्या 59,87,389 थी, जिसमें लद्दाख की जनसंख्या 1,32,372 भी सम्मलित है। 1995 में जिलों की जनसंख्या के अनुसार विधानसभा सीटों का निर्धारण किया गया।

परिसीमन आयोग 1995 की रिपोर्ट के अनुसार कुल 111 सीटों का निर्धारण किया गया जिनमें 87 सीटें जम्मू- कश्मीर क्षेत्र के लिए बनाई गर्इं। इनमें 37 सीटें जम्मू क्षेत्र, 46 कश्मीर क्षेत्र व चार सीटें लद्दाख क्षेत्र के लिए बनाई गर्इं। पाक द्वारा गैरकानूनी कब्जे वाले कश्मीर क्षेत्र के लिए 24 सीटें बनाई गईं।

मांग अस्वीकार

जस्टिस जीडी शर्मा आयोग के सम्मुख भारतीय जनता पार्टी व उसके सहयोगी संगठन ने क्षेत्रफल के हिसाब से सीटों का निर्धारण किए जाने की मांग रखी थी। उन्होंने बताया कि जम्मू क्षेत्र में 26000 वर्ग किमी और कश्मीर क्षेत्र में 15120 वर्ग किमी और बाकी 57000 वर्ग किमी लद्दाख में आता है। आयोग ने जनसंख्या के अनुसार सीटों का बंटवारा किया, जो लागू किया गया।

अभी तक जम्मू-कश्मीर (लद्दाख क्षेत्र छोड़कर) में 83 विधानसभा सीटें ही थी। वहां की विधानसभा व लोकसभा परिसीमन करने के लिए भारत सरकार ने छह मार्च, 2020 को जस्टिस रंजना देसाई (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में नया परिसीमन आयोग बनाया, जिसका काम 2011 के जनगणना जनसंख्या के अनुसार सीटों का विभाजन करना है। 2011 की जनगणना के अनुसार एक विधानसभा की औसत जनसंख्या 1,36,300 है।

आयोग का कथन

20 दिसंबर, 2021 को एक प्रेस नोट भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से निकाला गया, जिसमें इसी दिन हुई बैठक का हवाला दिया गया कि परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9 (1अ) को जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 की धारा 60 (2इ)के साथ पढ़ा जाता है, जो इस प्रकार है- सभी निर्वाचन क्षेत्र यथासाध्य भौगोलिक रूप में संग्रहीत क्षेत्र होंगे और उनका परिसीमन करते समय प्राकृतिक विशेषताओं, प्रशासनिक इकाईयों की विद्यमान सीमाओं, संचार सुविधाओं और सार्वजनिक सुविधा को ध्यान में रखना होगा। इसमेंं जिलों की संख्या 12 से 20 व तहसीलों की संख्या 52 से 207 करने का जिक्र किया गया है। जनसंख्या के घनत्व का भी हवाला दिया गया, जिसके अनुसार किश्तवार जिले में 29 लोग प्रति वर्ग किलोमीटर व श्रीनगर जिले में 3436 लोग प्रति वर्ग किलोमीटर बताया गया है।

असंगत आधार

गौरतलब है कि आज तक जब भी भारत सरकार ने लोकसभा या विधानसभा के लिए कभी भी परिसीमन किया है उसे जनगणना के जो आंकड़े उपलब्ध हैं, उनके अनुसार किया गया है। सभी परिसीमनों का आधार केवल और केवल जनसंख्या को रखा गया है। इसके अलावा कोई और आधार अगर परिसीमन में लाया जाता है तो वह गैरकानूनी होगा।

निर्वाचन आयोग के प्रेस नोट में किश्तवार जिले में 29 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या बताया गया है, जो सही नहीं है। किश्तवार जिले का क्षेत्रफल 1644 वर्ग किमी है और उसकी जनसंख्या 2,30,696 है, जो 140 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी बैठता है, न कि 29। इसी तरह श्रीनगर जिले की कुल जनसंख्या 12,36,829 है, जो 625 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी बैठता है न कि 3436, जैसा कि निर्वाचन आयोग ने बताया है।

दिलचस्प है कि जम्मू-कश्मीर में 1995 में किए गए परिसीमन के समय भी प्रति वर्ग किमी क्षेत्र के प्रश्न जस्टिस जीडी शर्मा आयोग के सामने रखे थे, जिसे उसने नहीं माना। भारत में इस प्रकार के कई जिलें है जहां प्रति वर्ग किमी में रहने वाले लोगों की जनसंख्या जम्मू-कश्मीर से बहुत कम है। जाहिर है कि इस तरह के गैरतार्किक आधार पर किए गए परिसीमन से आयोग की विश्वसनीयता प्रभावित होगी।
(लेखक ओबीसी कमीशन, दिल्ली सरकार के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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