Monday, February 14, 2022

जालौन के तीनों सीटों पर अलग-अलग समीकरण

सुनील कुमार शर्मा

जालौन जिला राजनीतिक दृष्टिकोण से मिश्रित प्रभाव वाला जनपद है। पहले यहां कांग्रेस का बोलबाला था लेकिन 1988 के स्थानीय निकाय के चुनाव के बाद भाजपा और बसपा यहां की राजनीति के मुख्य खिलाड़ी बन गए। यदाकदा समाजवादी पार्टी भी सफलताएं हासिल करके मुकाबले को तिकोना बनाने की कोशिश करती रही। इस बार यहां की तीनों सीटों पर अलग-अलग नजारा है, लेकिन बसपा की स्थिति प्रदेश में कुछ भी हो पर जालौन में हर सीट पर उसका उम्मीदवार जोर दिखाता है। 2017 के विधानसभा चुनाव में तीनों सीटों पर मतदाताओं ने भाजपा उम्मीदवारों को बड़े अंतर से जीत दिलाई थी, लेकिन इस बार मुकाबला कड़ा है।

भाजपा ने कालपी क्षेत्र में न केवल अपने विधायक नरेंद्र पाल सिंह का टिकट काट दिया है, बल्कि इस सीट को सहयोगी दल निषाद पार्टी के हवाले कर दिया है। निषाद पार्टी ने छोटे सिंह को उम्मीदवार बनाया है। वे एक बार बसपा के टिकट पर विधायक रह चुके हैं। कमल निशान न होने से भाजपा के कार्यकर्ता इस सीट पर भ्रमित स्थिति में हैं।

दूसरी ओर, जिले में कांग्रेस उम्मीदवार उमाकांती सिंह पति सुरेंद्र सिंह सरसेला के निजी प्रभाव के कारण मुकाबले में उतरी हैं। उमाकांती सिंह 2012 में भी पति के प्रभाव के कारण कांग्रेस के टिकट पर विधायक बनी थीं। यहां समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार विनोद चतुर्वेदी भी 2007 में (जब उरई सदर विधानसभा आरक्षित नहीं थी) कांग्रेस के ही टिकट पर विधायक रहे थे।

दूसरी ओर, माधोगढ़ विधानसभा क्षेत्र में भाजपा ने निवर्तमान विधायक मूलचंद निरंजन को दोहराया है। बसपा ने शीतल कुशवाहा को उम्मीदवार बनाया है जिनके ससुर संतराम कुशवाहा 2012 में बसपा के ही टिकट पर विधायक बने थे जबकि सपा ने एक नए चेहरे राघवेंद्र सिंह भदौरिया को अवसर दिया है। उनके ससुर डाक्टर गोविंद सिंह कुशवाह मध्य प्रदेश के प्रभावशाली कांग्रेस नेताओं में है जो पिछले कई चुनावों से पड़ोस की लहार विधानसभा सीट से विधायक निर्वाचित होते रहे हैं।

इस बार उन्होंने यहां अपने दामाद के लिए पूरी प्रतिष्ठा दांव पर लगा रखी है जिसका असर मध्य प्रदेश की सीमा से लगे 12 ग्रामों में साफ देखने को मिल रहा। कांग्रेस के उम्मीदवार सिद्धार्थ दिवोलिया हैं। उनका भी यह पहला चुनाव है। मुख्य संघर्ष त्रिकोणीय है। 2012 से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई उरई सदर विधानसभा सीट पर अभी तक हुए दो विधानसभा चुनावों में नतीजे अलग-अलग रहे हैं। 2012 में सपा को विजयश्री मिली थी और 2017 में भाजपा को।

भाजपा ने इस बार फिर अपने निवर्तमान विधायक गौरी शंकर वर्मा पर भरोसा जताया है और सपा ने दयाशंकर वर्मा को उम्मीदवार बनाया है। गत चुनाव में सपा ने दयाशंकर वर्मा का टिकट काटकर महेंद्र कठेरिया को उम्मीदवार बनाया था, तब पहली बार गौरी शंकर वर्मा विधायक निर्वाचित हो पाए थे। बहुजन समाज पार्टी ने सतेंद्र सिंह उर्फ श्रीपाल पर दांव लगाया है जो एक बार पूर्व में भी उम्मीदवार रह चुके हैं।

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From: Jansatta

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