हिंदी साहित्य की धज को जिन साहित्यकारों ने सबसे ज्यादा ऊंचा किया, दिलचस्प है कि वे इस भाषा के आरोहण और विस्तार के दौर में यह कार्य कर रहे थे। यह हिंदी के विकास के साथ आधुनिक विचार पद्धति के प्रति उसकी भीतरी तैयारी को दर्शाता है। हिंदी आलोचना की आचार्य परंपरा के अवदान को आज भी अगर श्रद्धा के साथ याद किया जाता है तो इसकी बड़ी वजह यह है कि तारीखी तौर पर इसके आगे की लकीरें बाद के दिनों में बहुत कम खींची गईं।
इस परंपरा के जगमगाते अक्षर कलशों के बीच जिन लोगों को खासतौर पर शुमार किया जाता है, उनमें बाबू गुलाबराय शामिल हैं। गुलाबराय हिंदी के उन साहित्यकारों में शामिल हैं, जिन्होंने खूब लिखा। आलोचना से लेकर ललित निबंध तक हर विधा में उन्होंने अपनी दखल और काबिलियत साबित की। उन्होंने हिंदी विमर्श को एक सांस्कृतिक परंपरा के रूप में आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।
गुलाबराय का जन्म 17 जनवरी, 1888 को इटावा (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनके पिता भवानी प्रसाद धार्मिक प्रवृत्ति के थे। उनकी मां भी भगवान कृष्ण की उपासिका थीं। वे सूरदास और कबीर के पदों को तल्लीन होकर गाया करती थीं। मां-पिता की धार्मिक प्रवृत्ति का असर बेटे पर भी पड़ा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मैनपुरी में हुई थी।
उन्होंने आगरा कालेज से स्नातक की परीक्षा पास की। इसके बाद दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर करने के बाद वे छतरपुर चले गए। छतरपुर में गुलाबराय की प्रथम नियुक्तिमहाराजा विश्वनाथ सिंह जूदेव के दार्शनिक सलाहकार के रूप में हुई। कुछ समय बाद वे महाराज के निजी सहायक बन गए। बाबू गुलाबराय ने छतरपुर दरबार में 18 साल बिताए और राज दरबार के न्यायाधीश की भी भूमिका निभाई। गुलाबराय को पशु-पक्षियों से बहुत प्रेम था।
जब महाराज का निधन हुआ, तब वे छतरपुर राज्य की सेवा छोड़कर आगरा वापस आ गए और अपने पालित पशु-पक्षियों को भी साथ लेकर आए। जो भी उनके संपर्क में आया, वही उनके परिवार का सदस्य और उनकी लेखनी का विषय बन गया।
हिंदी साहित्यके लिए गुलाबराय का दार्शनिक अवदान अपूर्व है। उनसे पूर्व हिंदी में इस क्षेत्र में मौलिक लेखन का बड़ा अभाव था। उनकी कीर्ति का बड़ा आधार उनके आलोचनात्मक निबंध भी हैं। गुलाबराय ने सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों ही तरह के निबंध लिखे। उन्होंने सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक आदि विविध विषयों पर अपनी लेखनी चलाकर हिंदी साहित्य को खासा समृद्ध किया। उनकी भाषा आडंबर शून्य है।
संस्कृत के प्रकांड पंडित होते हुए भी उन्होंने अपने लेखन में कहीं भी पांडित्य प्रदर्शन नहीं किया। उनका लेखन संयत, गंभीर और प्रवाहपूर्ण है। ‘ठलुआ क्लब’, ‘कुछ उथले-कुछ गहरे’ और ‘फिर निराश क्यों’ उनकी चर्चित रचनाएं हैं। उन्होंने ‘मेरी असफलताएं’ नाम से आत्मकथा लिखी। आनंदप्रियता और मनोविनोद बाबू गुलाबराय की शख्सियत की एक ऐसी खासियत है, जिसकी चर्चा आज भी जब-तब होती है। वे सभी त्योहार धूमधाम से मनाते थे।
उम्र के साठ वर्ष बीतने पर उन्होंने इन उत्सवों में अपना जन्मदिन मनाने का एक उत्सव और जोड़ लिया था। इस दिन आगरा में उनके घर ‘गोमती निवास’ पर एक साहित्यिक गोष्ठी होती थी। इसमें अनेक साहित्यकार आते थे। उन्होंने मौलिक ग्रंथों की रचना के साथ-साथ अनेक ग्रंथों का संपादन भी किया है। हिंदी साहित्य की जनप्रियता को बहाल रखते हुए उन्होंने इस भाषा के रचनात्मक फैलाव को बड़ा विस्तार दिया।
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From: Jansatta
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