Saturday, January 1, 2022

कानून जब हथियार बन जाता है

नवंबर, 2008 के अंत में मुंबई पर आतंकी हमले के बाद मुझसे वित्त मंत्रालय छोड़ कर गृह मंत्रालय जाने का अनुरोध किया गया था। मैं स्वीकार करता हूं कि ऐसा करने में मुझे थोड़ी हिचक थी, क्योंकि मुझे उम्मीद थी कि वित्तमंत्री के रूप में मई, 2009 में मैं पांच साल पूरे करूंगा। हालांकि तत्काल ही मुझे लगा कि यह एक दायित्व था, जिसे पूरा करने के लिए मैं बाध्य था। एक दिसंबर, 2008 को मैंने गृह मंत्रालय का काम संभाल लिया था।

मेरे कार्यकाल के शुरू में ही मेरा सामना सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून 1958 (अफस्पा) को हटाने की भावुक अपीलों से हुआ। इस कानून के तहत केंद्र सरकार किसी क्षेत्र को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित कर सकती है और उस क्षेत्र में यह कानून लागू कर सकती है। इसी तरह आठ राज्यों में राज्यपाल (राज्य सरकारें) इस शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं। एक बार लगने के बाद यह कानून कब तक लागू रहेगा, इसकी समय सीमा को लेकर इसमें कुछ नहीं कहा गया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया और छह माह की अवधि पूरी होने के पहले इसकी समीक्षा को लेकर सरकार को बाध्य किया।

इस बाध्यता ने अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं को थोड़ी राहत तो दी, क्योंकि एक बार कानून लागू कर दिए जाने के बाद राज्य सरकारें इसे हटाने की अनिच्छुक ही रहती थीं। उदाहरण के लिए, मणिपुर 1980 से लगातार इसे अधिसूचित और लागू करता रहा है। असम 2017 से लगातार हर छह महीने में इसकी समीक्षा करके अवधि को बढ़ाता रहा है। नगालैंड (पूरे राज्य) और अरुणाचल प्रदेश (तीन जिलों और दो थाना क्षेत्रों) को केंद्र सरकार नियमित रूप से ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित करती आई है।

इरादा प्रतिरक्षा और प्रभाव सजा से माफी
राज्य (केंद्र या राज्य सरकार) सशस्त्र बलों- सेना, वायुसेना और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों का आभारी है। ये निर्णय करने वाली शक्तियां हैं। जहां सेना तैनात होती है, वहां असल शक्ति सेना के पास ही होती है। तीन मई 2015 के इसी स्तंभ में मैंने कानून का विश्लेषण किया था। इस कानून के अतंर्गत सेना को जो अधिकार हासिल हैं, उन्होंने सेना को जरा निष्ठुर बना डाला है। इन अधिकारों में किसी भी पनाहगाह या ढांचे को ढहा देने, बिना वारंट गिरफ्तार कर लेने और बिना वारंट तलाशी और जब्ती जैसे कदम शामिल हैं। इनमें से हर अधिकार सामान्य कानून यानी भारतीय दंड संहिता के ठीक उलट है, कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़ कर। पुलिस अधिकारी को जो सबसे सख्त अधिकार दिया गया है वह यह कि अगर वह जरूरी समझता है तो पांच या इससे ज्यादा लोगों के जमावड़े पर गोली चला सकता है, जिसमें किसी की मौत भी हो सकती है।

अफस्पा के खिलाफ मामला यह है कि सशस्त्र बलों के जवान यह नहीं देखते कि क्या ताकत का इस्तेमाल टाला जा सकता है। जब एक बार वे संघर्ष से निपटने के हालात में होते हैं तो वे अन्य विकल्पों के बारे में नहीं सोचते, वे अधिकतम बल का प्रयोग करते हैं। इस कानून की धारा छह सशस्त्र बलों को मुकदमे से संरक्षण प्रदान करती है। यही असल कारण है कि यह प्रावधान सशस्त्र बलों को सजामाफी के साथ काम करने को उकसाता है।

यह तो सब जानते हैं कि सामान्य पुलिस भी शक्तियों का दुरुपयोग करती है। अक्सर ही ऐसे बेजा इस्तेमाल को राज्य की नीति की हरी झंडी मिली होती है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश जहां ‘मुठभेड़ें’ राज्य की कानून प्रवर्तन में शामिल हैं और बड़े गर्व के साथ उनका बखान किया जाता है। एक राज्य में जिसे ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित कर दिया गया हो, सशस्त्र बल बेहद तनाव में काम करते हैं और अफस्पा एक हथियार बन जाता है।

रद्द करने का पुख्ता मामला
अफस्पा को रद्द करने की मांग पुरानी है। 2005 में न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी समिति ने इसे रद्द करने की सिफारिश की थी। बाद के आयोगों और समितियों ने भी उनके इस विचार का समर्थन किया। न्यायमूर्ति जेएस वर्मा आखिरी थे, जिन्होंने अफस्पा को जारी रखने की समीक्षा करने की तत्काल जरूरत बताई थी।

मेरे विचार से अफस्पा को रद्द कर दिया जाना चाहिए। उग्रवाद और आतंकवाद से निपटने के लिए और भी कानून हैं, जैसे गैरकानूनी गतिविधियां (निरोधक) कानून यानी यूएपीए और राष्ट्रीय जांच कानून (एनआइए)। असल में यूएपीए को लेकर अनुभव यह रहा है कि इस कानून को लेकर भी समीक्षा का दमदार मामला बनता है। अफस्पा को रद्द करने का मामला लंबे समय से अटका पड़ा है।

असम का मामला सबक लेने वाला है। 2017 में गृह मंत्रालय ने असम सरकार से अफस्पा को हटाने या जहां यह लागू था, वहां इसका दायरा कम करने को कहा था। असम ने मना कर दिया। 2018 में गृह मामलों की स्थायी समिति ने असम सरकार से पूछा कि गृह मंत्रालय की सलाह के विपरीत पूरे राज्य को ‘अशांत क्षेत्र’ क्षेत्र घोषित कर दिए जाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी। इसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं था।

तानाशाह सरकार और कानून
चार दिसंबर, 2021 को तेरह नागरिकों के मारे जाने (गलत पहचान के कारण, जिसके लिए सेना माफी मांग चुकी है) के बाद मणिपुर, नगालैंड और मेघालय के मुख्यमंत्रियों ने इस कानून को निरस्त करने की मांग की है। मणिपुर की दलील हास्यास्पद है: यह राज्य सरकार, जिसने इस कानून को लागू किया है और इस अधिसूचना को रद्द करने से मुख्यमंत्री को कोई नहीं रोक सकता।

तथ्य यह है कि 2014 के बाद से सरकार और ज्यादा तानाशाह हो गई है। इसका नतीजा यह होना ही था कि आंतरिक सुरक्षा के लिए जब पुलिस और सशस्त्र बलों की तैनाती की गई तो वे और ज्यादा दमनकारी हो गए। अफस्पा जो एक ढाल बनाया गया था, एक हथियार बन गया। सशस्त्र बलों के भीतर भी अफस्पा रद्द करने के समर्थन में आवाजें उठ रही हैं, लेकिन दुख की बात यह है कि वे मौन हैं।

बतौर एक गृहमंत्री मैंने अफस्पा को रद्द करने का समर्थन किया था। वैकल्पिक रूप से मैंने इस कानून में संशोधन की भी दलील दी थी। मैं नाकाम रहा और 2015 के स्तंभ में मैंने अपनी कहानी बयान की थी। आज हमारे पास एक तानाशाह सरकार है, तानाशाह प्रधामंत्री हैं और तानाशाह गृहमंत्री हैं। इस कानून को रद्द करने या इसमें संशोधन तक की उम्मीद शून्य है। सिर्फ एक ही रास्ता है- संवैधानिक अदालतें।

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From: Jansatta

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