उत्तर प्रदेश में दो महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काशी प्रेम और काशी विश्वनाथ मन्दिर को उनके प्रयासों से मिले भव्यतम स्वरूप का असर साफ नजर आ रहा है। अखिलेश यादव ने इस आयोजन पर जहां मोदी पर एक बयान देकर जहां अपनी बेचैनी जाहिर की वहीं मायावती ने इस मामले में खामोश रहना है बेहतर समझा। मायावती की सियासी गंभीरता ने सोमवार को यह साबित कर दिया कि सियासत में अनुभव बहुत मायने रखता है। उधर, रविवार को जयपुर में राहुल गांधी का यह कहना कि मैं हिन्दू हूं हिन्दूवादी नहीं, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस में जान फूंकने की कोशिशों में जुटी प्रियंका गांधी की कोशिशों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
वाराणसी में सोमवार को काशी विश्वनाथ मन्दिर के भव्य स्वरूप के लोकार्पण के मौके पर नरेंद्र मोदी ने जिस अंदाज में शिव अराधना की उसने उत्त्तर प्रदेश में दो महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव की पटकथा लिखी है। उस पटकथा के लिखे जाते ही अखिलेश का बयान भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के चेहरों पर मुस्कुराहट बिखेर गया है। उनके इस बयान से उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को नाराज किया है।
हालांकि बिना नाम लिए दिए बयान पर मंगलवार को अखिलेश ने साफ किया कि उनके बयान का गलत मतलब निकाला गया। वे यह कहना चाह रहे थे कि यूपी में भाजपा सरकार अंतिम दिनों में है। मैं प्रधानमंत्री की लंबी उम्र की कामना करता हूं। वैसे अखिलेश बयान देने से पहले इस बात को भूल गए कि सोमवार को दुनिया भर में ट्विटर पर घंटों काशी विश्वनाथ धाम ट्रेंड करता रहा। हैशटैग 700 करोड़ बार देखा गया, 35 करोड़ से अधिक लोग हैशटैग तक पहुंचे और साढ़े तीन लाख से अधिक लोगों ने उस पर ट्वीट किए।
आलम यह रहा कि जब तक नरेंद्र मोदी काशी में पूजा और उससे जुड़े कार्यक्रमों में शिरकत करते रहे तब तक, यानी सुबह से शाम तक ट्विटर पर उनको चाहने वालों की वे पसंद बने रहे। लेकिन अखिलेश, सियासी जल्दबाजी में जनता के इस मिजाज को भांप नहीं पाए। दरअसल, अखिलेश यादव इस वक्त समाजवादी पार्टी के पारंपरिक कहे जाने वाले अल्पसंख्यक वोट बैंक को बचाने की कोशिशों में जुटे हैं।
उनकी निगाह उत्तर प्रदेश की उन 147 विधानसभा सीटों पर है जहां मुसलमान मतदाता हार और जीत का फासला तय करने की कुव्वत रखता है। वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश में हुए उस विधानसभा चुनाव में, जिसमें समाजवादी पार्टी ने पहली बार पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था। उस चुनाव में अल्पसंख्यक मतदाता मुलायम सिंह यादव के सपा अध्यक्ष होने और उनके ही मुख्यमंत्री बनने की सोच कर समाजवादी पार्टी के साथ खड़ा हुआ था।
समाजवादी पार्टी से मुलायम सिंह यादव के किनारे होने के बाद मतदाताओं की वह बिरादरी सपा का साथ छोड़ गई। जिसके परिणाम वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को साफ दिखा भी। वह अर्श से फर्श पर आ गई। अखिलेश यादव को अपने पारम्परिक मतदाता को बचाने की फिक्र इस लिए भी अधिक है क्योंकि इस बार प्रियंका गांधी की शक्ल में कांग्रेस मुसलमानों को रिझाने की पुरजोर कोशिश में है। कांग्रेस की यही कोशिश अखिलेश की बेचैनी बढ़ा रही है। जबकि रविार को जयपुर में राहुल गांधी का खुद को हिंदू बताना लेकिन हिंदुत्ववादी होने से बचने के बयान ने उत्तर प्रदेश में प्रियंका की पेशानी पर बल पैदा कर दिया है।
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From: Jansatta
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