सुरेश सेठ
रवींद्र बाबू ने कभी ‘एकला चलो रे’ का संदेश दिया था। उसकी आवाज आज चारों ओर गूंजती है। ‘सुनो, तेरे साथ कोई न आए, फिर भी तुझे अकेला चलना है। तेरे रास्ते में बिजलियां गिरें, तूफान आए, फिर भी तुझे चलना है।’ लेकिन चलना कहां है? पुलिस वाला बेंत बरसाते हुए पूछता है, बंधु चले कहां? अकेले चलने के लिए नहीं कहा, घर में बंद होकर जीने के लिए कहा है। कैसे बताएं उन्हें कि दिन-रात अपने स्वनिर्वासन में, आईने में अपने चेहरे का सामना करना कितना कठिन होता है। मेकअप रहित चेहरा आपको मोहभंग की स्थिति में पहुंचा देता है।
अब कैसे करें उसके गुलो-रुखसार की बातें, कंटीले नैनों का जिकर! सारा दिन बात करने के लिए है भी क्या? महामारी विश्वव्यापी हो रही थी। हम सोचते थे कि हमारा राष्ट्र पकड़ में नहीं आएगा। राष्ट्र फंसा तो सोचते थे कि हमारे राज्य, हमारे शहर, हमारे मोहल्ले पर उसकी फांस और फंदे नहीं आएंगे। अब मौत के कदमों की आहट करीब होती है। मीडिया के खबरची हर क्षण उसकी खबरों को और भयानक बना देते हैं। लीजिए, अब दिन-प्रतिदिन सद्गृस्थ बनने का वक्त आ गया। अब घर वाली को भी यही संदेश मिला है, इसलिए वह अपने राम को अनुशासन का महत्त्व समझा रही है।
इस महामारी में स्वच्छ तो रहना ही होगा। अकेलेपन को झेलते हुए उनकी कमर का दर्द जाग उठा, घुटने पीड़ा देने लगे। बैठे-बैठे अर्जीण हो गया। खट्टी डकारों के इलाज के लिए अब तो पड़ोस के सर्वज्ञाता भी अपनी खिड़की का पल्ला नहीं खोलते। अब हकीम से कर्ता तक, सब भूमिकाएं हमें ही करनी होंगी। देसी नुस्खों से मालिश तक के सब गुर सीखने होंगे। माहौल असाधारण है, और स्वनिर्वासन है। इसलिए घरों में सफाई का महत्त्व समझिए। हम सहधर्मी हैं और सहयोगी भी। प्रगतिशील घोषित थे और स्त्री समानाधिकार और सशक्तिकरण के बहुत बड़े पैरोकार। इसलिए अब घर में पोंछा लगाने में मदद करनी थी। हम आज तक अपने महिमामंडन के लिए न जाने कितनी तस्वीरें वाट्सऐप और फेसबुक पर डालते हैं, कृपया अपने फर्श पर पोंछा लगाने के रमदान की तस्वीरें भी डाल दीजिए। ऐसे ही बहुत से अन्य पीड़ित पतियों की ‘लाइक’ आपको मिल जाएंगी।
जबसे महामारी की पदचाप के साथ हमारा आत्मनिर्वासन हुआ, हमारी तो छह की छह इंद्रियां जाग उठीं। छत से मुंडेरों पर हमें कौओं और कबूतरों के साथ नए-नए पंछियों की प्रजातियां नजर आने लगीं। कोयल की रुठी हुई आवाज हमें सुनाई नहीं दी। हां, इस बीच हमें अपनी ही आवाज अधिक कर्कश सुनाई देने लगी। आज तक अपनी ही आवाज के इश्क में गिरफ्तार रहे। सदा सोचते थे, हमसे अच्छा न कोई सोचता है, और न कोई बोलता है। अब अकेले हुए तो इस विश्वास का भ्रम खुलता नजर आने लगा। हमें ही क्यों लगता है, इस भ्रम में तो हमारी पूरी दुनिया, पूरी सदी गिरफ्तार हो गई थी। अब रहस्यमय दैनिक शक्ति का कुल्हाड़ा पड़ा, तो कांपता हुआ आदमी तंत्र-मंत्र, ग्रह-नक्षत्र, नजूमियों और खाल फेंकने वालों का सहारा लेता नजर आता है। अरे, यह अंधेरा तो एक न एक दिन छूट ही जाएगा, चाहे उसकी कितनी ही बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े, लेकिन मनों पर छाए अंधेरों को दूर कौन करेगा?
वह स्वच्छ निर्मल आकाश भी नहीं कि जिसमें एक नई चमक लेकर उभरता हुआ चांद हमें उस वातावरण का आभास देता है, जिसे पाने के लिए पर्यावरण प्रदूषण के नाम पर हमने करोड़ों रुपए व्यय कर दिए थे। जानते हैं कि यह कठिन वक्त गुजर जाएगा तो यह निर्मल आकाश, यह चमकता हुआ चांद हमसे विदा ले लेगा। डरे हुए घरों के किवाड़ खुल जाएंगे। नए वक्त का जश्न मनाते हुए पुराने मसीहा अपने मास्क उतार मुखौटे पहन चले आएंगे, आपके लिए चिंता भरे संभाषणों के साथ कि बहुत कठिन रही डगर पनघट की। उसे और कठिन बनाया मास्क से लेकर सब्जी बेचने वालों ने दुगने-चौगुने दाम लेकर।
अब वक्त बदल गया है। आइए, इस आकाश को फिर गंदला करें। चांद को उड़ती धूल में खो जाने दें। नव-निर्माण शुरू करना है। धनराशियां आबंटित करो, सर्वहारा के नाम पर हमारी जेबों के लिए। इन महाबलियों को नए समाज को पुराने तेवर देने का यह मंत्र फूंकना है। बस महामारी टलने का इंतजार कीजिए। इन महामारियों के नाम बदल जाते हैं और इनके साथ-साथ अच्छे दिनों के आंकड़ों में से सिर उठाते हुए भुखमरी सूचकांक की वह पायदान, जिस पर देश फिसल कर और नीचे चला गया है। फिसलते देश ने हाथ उठा कर निजात चाही, तो भ्रष्टाचार का सूचकांक बोला, जहां हो वहीं रहो। भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान चलने दो, क्योंकि भ्रष्टाचार तो कम होना नहीं है, कम से कम उसकी चर्चा को तो एक नया तेवर मिले। इस तेवर में से उभरता है एक सामूहिक कोरस, जो कभी चीत्कार लगता है और कभी रुख्सत होते हुए लोगों की आखिरी हिचकियां।
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