दिल्ली से सटे औद्योगिक महानगर नोएडा में इन दिनों बड़ी संख्या में यातायात पुलिसकर्मियों की तैनाती के बावजूद प्रबंधन और लालबत्ती पर लगने वाले जाम में कोई सुधार नहीं आ पाया है। अधिकांश चौराहों पर सीसीटीवी कैमरों के लगे होने से यातायात नियमों का उल्लंघन होने पर चालान खुद-ब-खुद कट रहे हैं।
बेदिल ने देखा कि चौराहों पर तैनात रहने वाले यातायात कर्मी केवल कुछ खास वाहनों पर भी ध्यान केंद्रित रखकर अपनी सार्थकता साबित करने का दिखावा भी कर रहे हैं, जबकि अधिकांश जगहों पर हाल ही में बने गति अवरोधकों (स्पीड ब्रेकर) पर सफेद रंग का पेंट नहीं होने से लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं। इसके बावजूद यहां कभी भी यातायात पुलिस कर्मी खड़े नहीं होते हैं। जबकि इस चौराहे से दर्जनों बार शहर के प्रमुख प्रशासनिक और प्राधिकरण अधिकारियों के वाहन गुजरते हैं।
नीति पर राजनीति
दिल्ली सरकार ने नई आबकारी नीति को लागू किया है। इस नीति के बाद से पुरानी सरकारी दुकानों की विदाई हो गई है और उनकी जगह नई माल जैसी दुकानों ने ले ली है। जहां-जहां नई दुकानें खुल रही हैं वहां पर स्थानीय लोगों के साथ मिलकर भाजपा कार्यकर्ता प्रदर्शन कर रहे हैं और इस नीति को लागू करने में सरकार को घेर रहे हैं। जबकि पंजाब में जब ‘आप’ शराब मुक्त करने के वादे कर रही है तो इस नीति के आधार पर आप की घेराबंदी तेज हो रही है क्योंकि नई नीति की बदौलत दिल्ली में शराब की नई दुकानों की संख्या बढ़ी है।
गले की हड्डी
राजधानी के एक अस्पताल में चल रहे आंदोलन के समय कुछ संगठनों के लिए आंदोलन गले की हड्डी बन गया है। एक संगठन के बैनर तले जब धीरे-धीरे करके सभी आंदोलनकारियों को जुटा लिया गया तो बड़े नेता ने एकदम से आंदोलन खत्म करने का एलान कर दिया। बेदिल को पता चला कि जमा हो चुके अन्य तमाम आंदोलनकारी इसके लिए तैयार नहीं थे, तो वे समझ नहीं पा रहे थे कि जिस दिन सुबह वे जुड़े उसी दिन दोपहर में आंदोलन खत्म कैसे कर दें। अब उनसे तो न आगे आते बन रहा न पीछे जाते। अंतत: तय हुआ कि आंदोलन चरणबद्ध तरीके से खत्म होगा।
जोर का झटका
दिल्ली कांग्रेस के एक पूर्व सांसद एक बार फिर हाथ को कमजोर करने में भिड़ गए हैं। दरअसल उन्हें जिम्मेदारी दिल्ली के सत्तारूढ़ दल के कुछ वरिष्ठ नेताओं की ओर से दी गई है। और जिम्मेदारी दी भी क्यों न जाती, आखिर वे भी तो लंबे समय तक पार्टी में रहे हैं, कार्यकर्ताओं की हैसियत व नस दोनों जानते हैं। पार्षद से सांसद तक के सफर करने वाले नेताजी दिल्ली में बचे कुछ दिग्गज माने जाने वाले कांग्रेसियों को ‘आम आदमी’ का नेता बनाने की में लगे हैं। पूर्वांचल से तालुक्क रखने वाले ये पूर्व सांसद महोदय अपने बेटे को दिल्ली से विधायक तो बनवा ही चुके हैं। अब वे अपने नए मिशन कांग्रेस की कब्र खोदने पर हैं। चर्चा है कि निगम चुनाव से पहले नेताजी कांग्रेस को एक और झटका देने की तैयारी में हैं।
फोन बना खतरा
दिल्ली पुलिस विभाग में इन दिनों अधिकारियों में चुप्पी साधने की होड़ लगी हुई है। जिले के उपायुक्त अपने ही नंबर को रांगनंबर कहने से बाज नहीं आ रहे। आला अधिकारियों की तो मन की चलती है। आराम से रहते हैं और इच्छा हुई तो फोन उठाते हैं वरना हमेशा या तो बिजी रहता है या फिर वे उठाने की जहमत मोल नहीं लेते।
बेदिल ने जब एक आला अधिकारी से इस बाबत पूछा कि अगर आप फोन नहीं उठाएंगे तो फिर खबरों की पुष्टि कैसे हो पाएगी। जवाब था कि आयुक्त ने जब पुष्ट और अपुष्ट करने का अधिकार जो हमसे छीन लिया है लिहाजा जो उठा लें और बात कर लें आप धन्य समझें। अन्यथा अब फोन उठाना खतरे से खाली नहीं है।
भीड़ की कमी
नगर निगम में कई ऐसे मौके होते हैं जब जमावड़ा शुरू हो जाता है। इसी तरह का एक उत्सव होता है नगर निगम के बजट सत्र का। लेकिन इस बार एक तो कोरोना दूसरा निगम का चुनाव और तीसरा सर्दी का मौसम। हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि विशेष बैठक में भी गिने चुने पार्षद आते हैं और बजट भाषण सुनने वालों की तो जैसे किल्लत ही हो गई है। हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि नगर निगम के दर्शक दीर्घा में अब मार्शल दिख रहे हैं जिन्हें आराम से बैठकर निगम की बैठकें देखने का मौका मिल रहा है।
-बेदिल
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