विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में अगर निष्पक्ष और स्पष्ट रूप से चुनाव होते हैं, तो लोकतंत्र सबसे अधिक मजबूत होता है। सवाल है कि अगर किसी भी राज्य में फर्जी मतदाता पाए जाते हैं, तो लोकतंत्र को भी इसके लिए खतरा हो सकता है। इस प्रकार चुनाव संबंधी सुधार विधेयक संसद में पास किया गया और इसके साथ-साथ इसमें विभिन्न प्रकार की सुधार प्रक्रिया भी तेजी से आगे कदम बढ़ाएगी। बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी होंगे, जिनका मतदाता सूची में कई स्थानों पर नाम होगा, जिन पर पूर्णविराम लगेगा। मतदाता सूची को आधार कार्ड से जोड़ने की प्रक्रिया में फर्जी मतदान पर भी विराम लगेगा और फर्जी मतदाताओं पर भी पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगेगा।
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग को प्रत्येक पांच वर्ष पर लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा तथा नगरपालिका पंचायत चुनाव कराने की जिम्मेदारी है। देश की सबसे बड़ी अदालत उच्चतम न्यायालय चुनाव संबंधी खामियों को दूर करने के अनेक बार निर्देश दे चुका है। मगर विपक्षी राजनीतिक दल इस पर भी सरकार के साथ सहमति न बना कर विभिन्न प्रकार के आरोप लगा रहे हैं, जिसमें मौलिक अधिकारों के हनन की बात कही जा रही है। पर इसमें नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन कहीं नजर नहीं आता।
नागरिक पहचान पत्र और विभिन्न प्रकार से देश की सुरक्षा को भी ध्यान में रखना चाहिए। चुनाव सुधार संबंधी इस विधेयक में फर्जी मतदाता तथा उसके साथ-साथ फर्जी पहचान पत्र और विभिन्न प्रकार की त्रुटियों को सुधारने का अवसर मिलेगा और इससे भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भी मजबूत होगा। इस बात का भी पता चलेगा कि आखिरकार हमारे देश में कौन से नागरिक अपने मत का इस्तेमाल करते हैं और कब वे अनुपस्थित रहते हैं।
’विजय कुमार धानिया, नई दिल्ली
महंगाई मार गई
‘तेजी से बढ़ती महंगाई लोगों के सामान्य जीवन को बहुत प्रभावित कर रही है, खास कर महिलाओं को, जो कोरोना के दौर में अपने अपने घरों का बजट किस तरह मैनेज कर रही हैं, वे ही जानती हैं। महंगाई के कारण हर चीज के लिए चाहे वस्तु हो या सेवा खरीदने के लिए उन्हें भारी परेशानियां हो रही हैं। महंगा राशन-पानी, महंगी-सब्जियां, वे किन-किन चीजों में कटौती करें यह समझ नहीं पा रही हैं। बढ़े फलों के दामों से वे उन्हें अपने बच्चों के लिए खरीदने की सोच भी नहीं पाती हैं। महंगे डीजल पेट्रोल ने भी एक जगह से दूसरी जगह जाना महंगा कर दिया, जिसके लिए भी सभी को दस बार सोचना पड़ता है।
महंगाई, बाजार का एक ऐसा गुणधर्म है, जिसका असर सीधे-सीधे कमाई पर पड़ता है। घटती कमाई, महामारी के प्रकोप से टूटते-बिखरते लोग, बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़े, महंगाई का दिखता हिंसक रूप। महंगाई बढ़ने के साथ कमाई का अधोमुखी रुख, आम लोगों को कर्ज लेकर भी जीने पर मजबूर कर रहा है। आज कमोबेश स्थिति यह है कि एक बड़ी आबादी, खाली जेबों के साथ उधार की जिंदगी जीने को बाध्य है।
’छाया कानूनगो, बंगलुरू
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