Monday, December 27, 2021

अफस्पा और सवाल

नगालैंड से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) हटाया जाए या नहीं, इस पर विचार पांच सदस्यों की समिति करेगी। समिति पैंतालीस दिन के भीतर रिपोर्ट देगी। नगालैंड के मोन जिले में इस महीने के शुरू में सेना के हाथों चौदह निर्दोष नागरिकों की हत्या और इसके प्रतिकार में भड़की हिंसा ने एक बार फिर इस कानून की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। साथ ही सशस्त्र बलों की भूमिका भी घेरे में है।

अफस्पा हटाने की मांग को लेकर राज्य में हिंसक प्रदर्शन हुए। हालात की गंभीरता को देखते हुए पिछले हफ्ते नगालैंड विधानसभा ने भी अफस्पा हटाने का प्रस्ताव पास करके केंद्र को भेज दिया था। हाल की घटना के बाद नगालैंड में जिस तरह की अशांति पैदा हुई, उससे केंद्र भी सकते में है। केंद्र की मुश्किल यह है कि नगालैंड में भाजपा की सहयोगी नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी की सरकार है। राज्य से अफस्पा हटाने के प्रस्ताव का भाजपा विधायकों ने भी पुरजोर समर्थन किया है। ऐसे में केंद्र के पास इस अतिसंवेदनशील मुद्दे को तत्काल किसी समिति के हवाले करने के अलावा और चारा था भी नहीं।

इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि अफस्पा का इस्तेमाल एक दमनकारी कानून के रूप में ज्यादा हुआ है। इस कानून के तहत सशस्त्र बलों को बेलगाम शक्तियां दे दी गर्इं। इसीलिए बेजा इस्तेमाल तो बढ़ना ही था। इस विशेष कानून को बनाने के पीछे मूल भावना तो यह थी कि अशांत क्षेत्रों में उग्रवादी गतिविधियों से निपटने के लिए इसका सहारा लिया जाएगा। इसीलिए सशस्त्र बलों को खुल कर सारे अधिकार दिए गए।

अफस्पा के तहत सशस्त्र बलों को बिना अनुमति किसी भी घर की तलाशी लेने, किसी को गिरफ्तार कर लेने और यहां तक कि कानून तोड़ने वाले व्यक्ति पर गोली चला देने जैसे अधिकार हासिल हैं। अगर सशस्त्र बलों की कार्रवाई के विरोध में लोग हिंसा करते हैं और उस सूरत में सशस्त्र बलों की गोली से लोग मारे जाते हैं तब भी गोली चलाने वालेबलों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई की इजाजत यह कानून नहीं देता। इसीलिए अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं जब निर्दोष नागरिक सशस्त्र बलों की ज्यादती का शिकार होते रहे हैं। याद किया जाना चाहिए कि मणिपुर में वर्ष 2000 में असम राइफल्स के जवानों ने दस निर्दोष लोगों को मार डाला था। उसके बाद मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने इस कानून को खत्म करने की मांग को लेकर सोलह साल तक अनशन किया।

देश की आतंरिक और बाहरी सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों की है। इसे सुनिश्चित करने के लिए ही अफस्पा जैसा कठोर कानून जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में लागू किया गया। पूर्वोत्तर के राज्य भी उग्रवाद के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। पड़ोसी देशों से उग्रवादी संगठनों को मदद, हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी यहां के लिए बड़ा संकट है। लेकिन इस आंतरिक सुरक्षा की आड़ में सशस्त्र बल स्थानीय नागरिकों का जिस तरह से दमन करते रहे हैं, उससे इन राज्यों के लोगों में इन बलों के प्रति नफरत और आक्रोश भर गया है।

अगर आजादी के सात दशक बाद भी पूर्वोत्तर के राज्यों में हालात इतने खराब हैं कि वहां बिना अफस्पा के काम नहीं चल पा रहा, तो इसके लिए दोषी हमारी नीतियां ही हैं। अगर सरकारें बार-बार अफस्पा की अवधि बढ़ाती हैं तो इसका मतलब क्या यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि वे अक्षम हैं और इसीलिए सशस्त्र बलों के दमन से ही सत्ता चलाना पसंद करती हैं? बदलते वक्त के साथ अफस्पा में भी बदलाव वक्त की मांग है।

The post अफस्पा और सवाल appeared first on Jansatta.



From: Jansatta

Read Full Post ㅡ https://ift.tt/32I8JkB

CM सम्राट पर भड़के भाई-बहन, तेजस्वी यादव ने बताया 'Cheap Minister', मीसा बोलीं- ये सरकार...

CM सम्राट पर भड़के भाई-बहन, तेजस्वी यादव ने बताया 'Cheap Minister', मीसा बोलीं- ये सरकार... From: ABP Live Read Full Post ㅡ htt...