अतुल कनक
पिछले कुछ वर्षों में देश की नदियों को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए बहुत बातें हुई हैं। बहुत पैसा भी विभिन्न योजनाओं पर खर्च किया गया है, लेकिन आज भी हालत नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली बनी हुई है। देश की अधिकांश प्रमुख नदियां प्रदूषण से जूझ रही हैं। हालांकि नदियों की यह स्थिति केवल भारत में नहीं है। दुनिया के अधिकांश देशों में नदियां इंसानी स्वार्थ और समाज की अनदेखी के कारण अपनी हालत पर आंसू बहा रही हैं। हैरानी कि पिछले कुछ सालों में दुनिया के उन इलाकों में भी नदियों की दुर्दशा की कहानी सामने आ रही है, जहां पानी की एक एक बूंद कीमती होती है। इस संबंध में ताजा उदाहरण ईरान की जायनदेह नदी का है। यह ईरानी पठार की सबसे बड़ी नदी है और मध्य एशिया के उस इलाके के एक बड़े हिस्से को सरसब्ज करती है, जिसे सामान्य तौर पर एक रेगिस्तान के रूप में जाना जाता है।
जायनदेह नदी सूखने से परेशान लोगों ने नवंबर के अंतिम सप्ताह में उग्र प्रदर्शन किया। हालांकि ईरान की अधिकांश नदियां मौसमी हैं, लेकिन जायनदेह में कुछ समय पहले तक पूरे साल पानी का प्रवाह बना रहता था। सन 1960 तक इस इलाके में तोमर संहिता का पालन किया जाता था। तोमर सोलहवीं सदी की एक व्यवस्था थी, जिसके अनुसार इस इलाके में पानी का प्रबंध किया जाता था। रेगिस्तानी इलाकों में अगर उपलब्ध पानी के प्रबंधन की कोई संहिता न हो, तो अराजकता की संभावना सदा रहती है।
मगर 1960 के बाद तोमर संहिता का पालन संभव नहीं हो सका, क्योंकि बढ़ती जनसंख्या और बदलती जीवनशैली के कारण लोगों की न्यूनतम जल आवश्यकता बदलने लगी। फिर इलाके में लगने वाले उद्योगों ने भी पानी में अपना हिस्सा बंटाना शुरू कर दिया। 1972 में इस नदी पर बिजली उत्पादन के लिए चादेगन बांध बना। धीरे-धीरे नदी के ऊपरी क्षेत्र में पानी के अत्यधिक उपयोग से उसकी निचली धाराएं सूखने लगीं और देखते-देखते हालत यह हो गई कि उस इस्फाहान शहर के नागरिक इस नदी के पानी को तरस गए, जिसका विकास ही जायनदेह नदी के सान्निध्य से हुआ था।
हालांकि जयानदेह नदी के बड़े हिस्से के सूखने का कारण लगातार अकाल की स्थिति को बताया जा रहा है, लेकिन सच यह है कि इसके लिए मनुष्य जिम्मेदार है, क्योंकि विकास की योजनाएं बनाते समय नदी के प्रवाह की आवश्यकताओं को अनदेखा कर दिया गया। बेशक समय के अनुरूप विकास हर इलाके की जरूरत होता है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों को बचाए बिना अगर विकास की प्रस्तावना लिखी जाती रहेगी, तो जीवन संकटों से घिर जाएगा।
जरफशान नदी ताजिकिस्तान में पामीर पर्वतमाला से शुरू होती है और करीब तीन सौ किलोमीटर पश्चिम की ओर बहने के बाद ताजिकिस्तान के पंजार्केंत शहर से गुजरती हुई उजबेकिस्तान में दाखिल होती है। फिर यह समरकंद के पास से बहती है। कभी जरफशान नदी का संगम अमू दरिया से होता था, लेकिन अब उस तक पहुंचने के पहले ही यह रेगिस्तान में लुप्त हो जाती है।
इसका पानी बड़ी मात्रा में सिंचाई और आधुनिक कारखानों के लिए शोषित कर लिया जाता है। अमू दरिया के प्रवाह के कारण मध्य एशिया की ही अराल सागर नामक झील विलुप्ति के कगार पर है। कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान के बीच स्थित यह झील अपने विशाल आकार के कारण सागर कही जाती रही है। लेकिन 1960 के दशक के बाद से इस विशाल जल स्रोत का सिकुड़ना शुरू हो गया है, क्योंकि इसमें पानी की आपूर्ति करने वाली नदियों- अमू दरिया और सिर दरिया के प्रवाह को नगरीय जीवन की जरूरतें पूरी करने के लिए बाधित कर दिया गया।
उधर विभिन्न फसलों की सिंचाई के लिए अराल सागर की जलराशि का दोहन जारी रहा। परिणाम यह हुआ कि यह विशाल जलाशय लोगों की उम्मीदों के बोझ तले कराहने लगा।
सन 2020 में आई एक रिपोर्ट में कहा गया कि इराक के अधिकांश इलाकों में जनता को पीने के लिए शुद्ध पानी तक नहीं मिल पा रहा है। सन 2018 में तो बसरा जैसे विकसित शहर में सैकड़ों लोगों को इसलिए अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा, क्योंकि शुद्ध जल के अभाव में उन्हें दूषित पानी पीना पड़ा था। इराक की जल व्यवस्था मुख्य रूप से यूफ्रेटस और टिग्रीस (दजला) नदियों पर निर्भर है, लेकिन ये दोनों नदियां अब सूखने लगी हैं। तुर्की के बांध बनाने के कारण दजला नदी का प्रवाह प्रभावित हो रहा है।
मध्य एशिया की नदियों और उसके आसपास के इलाकों के जलाशयों की स्थिति पर सोवियत संघ के विघटन के कारण भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। लोकतंत्र के हितैषियों के लिए भले सत्ता के विकेंद्रीकरण की यह घटना तब सुख देने वाली रही हो, लेकिन इसके कारण एक ही व्यवस्था के तहत विभिन्न इकाइयां जिस तरह एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति करती थी, वह नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई। सोवियत संघ के अस्तित्व के समय कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान ऊर्जा उत्पादन के संदर्भ में मजबूत थे, जबकि ताजिकिस्तान और किर्गिज्स्तान के पास पर्याप्त मात्रा में जल संसाधन उपलब्ध थे।
एक मजबूत केंद्रीय सत्ता के अधीन ये गणराज्य एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे, लेकिन जब सब संप्रभु हो गए तो सबके लिए अपने स्वार्थ सर्वोपरि हो गए। इससे कुछ गणराज्यों के लिए सर्दी में पर्याप्त मात्रा में बिजली का प्रबंधन समस्या हो गया तो कुछ अन्य के लिए अपने किसानों को पानी उपलब्ध कराना। इलाके की दो प्रमुख नदियों अमू और सिर की हालत पतली होने से इस समस्या ने और विकराल रूप ले लिया।
पिछले साल पानी की कमी के कारण उज्बेकिस्तान में किसान अपनी फसलों को पानी नहीं दे सके, जिससे सब्जियों और अन्न की उपलब्धता प्रभावित हुई और सब्जियों के दाम आसमान पर चढ़ गए। उज्बेकिस्तान के समरकंद में पानी की कमी के कारण अधिकारियों को कुछ समय तक पानी की राशनिंग करनी पड़ी, क्योंकि जरफशान नदी में पानी की पर्याप्त उपलब्धता नहीं थी। तुर्कमेनिस्तान भी पानी की उपलब्धता की दृष्टि से पिछले एक दशक की सबसे बुरी स्थिति से गुजर रहा है।
उधर नदियों पर अंधाधुंध बांध बना कर चीन ने एशिया के अन्य देशों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। सन 2013 में चीन में जल संसाधनों का एक व्यापक सर्वेक्षण हुआ। इसकी रिपोर्ट बताती है कि चीन में नदियों की हालत तेजी से पतली होती जा रही है और पिछले साठ सालों में छोटी-बड़ी करीब सत्ताईस हजार जल धाराएं लुप्त हो गई हैं। मेकांग नदी अपने सबसे निचले स्तर पर बह रही है। चीन की ही क्यों, दुनिया की दो तिहाई से अधिक नदियों को विकास के नाम पर सभ्यता ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का शिकार बनाया है।
हालत यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी नदियों में गिनी जाने वाली नील नदी और रियो ग्रांडे नद भी अब उन नदियों में शुमार हो गई हैं, जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। हां, आर्कटिक जैसे सुदूर प्रदेशों में बहने वाली एक दर्जन से अधिक नदियों का प्रवाह अभी अक्षुण्ण है। इसका एक बड़ा कारण शायद यह है कि विकास की महत्त्वाकांक्षाएं इन क्षेत्रों को नहीं छू सकी हैं।
हालत यह है कि अमेरिका जैसे विकसित देश में भी आधी से अधिक नदियां और जल धाराएं जीव वैज्ञानिक तौर पर बहुत बुरी हालत में हैं। जब कोई नदी संकटग्रस्त होती है तो उसके आसपास रहने वाले मनुष्य ही संकट में नहीं होते, बल्कि नदी में रहने वाले जीव और जल वनस्पति भी अस्तित्व के सवाल से जूझते रहते हैं।
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From: Jansatta
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