Tuesday, December 14, 2021

बेलगाम महंगाई

आम लोगों के सामने पिछले करीब दो साल से कई तरह की मुश्किलें लगातार पेश आ रही हैं और उनके लिए अपने जीवन को सहज रख पाना एक चुनौती बनी हुई है। महामारी की मार के अलग-अलग रूपों ने रोजमर्रा की जरूरतों से भी समझौता करने के हालात पैदा कर दिए हैं। आय और खर्च का संतुलन इस कदर बिगड़ता जा रहा है कि कई बार लोग लाचार भाव से बाजार की ओर देखते हैं।

मसलन, आय में तेजी से गिरावट के साथ घटती क्रय-शक्ति या फिर बेरोजगारी में इजाफे के दौर में महंगाई ने लोगों के जीवन को किस स्तर तक प्रभावित किया है, उससे सभी वाकिफ हैं। जनता का खयाल रखने का भरोसा देने वाली सरकारों को इस समस्या के हल के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत थी। लेकिन हालत यह है कि एक ओर लोगों के सामने रोजमर्रा का खर्च चलाना भारी पड़ रहा है, दूसरी ओर लगभग सभी जरूरत की चीजों की कीमतें बेलगाम बढ़ती जा रही हैं। खासकर खाने-पीने की वस्तुओं की महंगाई ने लोगों को ज्यादा परेशानी में डाल दिया है।

पहले ही मुश्किल से जूझते लोगों को महंगाई के मोर्चे पर बीते दो दिनों में दो बड़े झटके और लगे हैं। सोमवार को जहां खुदरा महंगाई दर में इजाफे की खबर आई, वहीं मंगलवार को थोक मूल्य सूचकांक ने भी चिंता बढ़ाई। अक्तूबर में जो खुदरा महंगाई दर 4.48 फीसद थी, वहीं नवंबर में बढ़ कर 4.91 फीसद हो गई। यानी अमूमन हर महीने इसमें बढ़ोतरी हो रही है। खुदरा महंगाई ने औसत भारतीय परिवारों पर कैसा असर डाला है, यह किसी से छिपा नहीं है। अब इसके बाद थोक मूल्य आधारित नवंबर में बढ़ कर 14.23 फीसद हो गई, जो अक्तूबर में 12.54 फीसद थी।

सरकार का कहना है कि मंहगाई की मौजूदा मुश्किल की वजह खनिज तेलों, मूल धातुओं, कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, रसायन और रासायनिक उत्पादों, खाद्य उत्पादों आदि की कीमतों में बढ़ोतरी है। यानी कहा जा सकता है कि सरकार की ओर से ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है, जो थोड़ी राहत का सबब बन सके। हालत यह है कि बहुत सारे साधारण परिवारों को अपनी थाली में कटौती करनी पड़ रही है, क्योंकि बाजार में अनाज से लेकर सब्जियों और खाद्य तेल आदि खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतें अब बहुत सारे लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं।

सवाल है कि थोक और खुदरा महंगाई दर में इस हालत के बावजूद यह मसला सरकार की फिक्र में शामिल क्यों नहीं है! महामारी की मार का सामना करने के क्रम में टुकड़ों में लागू पूर्णबंदी के लंबा खिंचने के दौर में भारी तादाद में लोगों को रोजी-रोटी से लाचार होना पड़ा। बाजार से लेकर उद्योग जगत में जैसी मंदी छाई, उसमें पूर्णबंदी के लगभग खत्म होने के बाद आज भी पहले जैसी सहजता नहीं आ पाई है। इसकी मुख्य वजह यह है कि उस दौर में अपना छोटा-बड़ा कारोबार ठप होने से लेकर बेरोजगारी के आलम में आज भी कोई बड़ा सुधार नहीं दिखा रहा है। खाने-पीने जैसी अनिवार्य जरूरतों को छोड़ दें, तो लोग बहुत जरूरी होने पर ही कोई सामान खरीद पा रहे हैं। अब भी महामारी से मुक्त वक्त की संभावना काफी दूर दिख रही है, जिस वजह से लोग खर्च के मामले में कोई जोखिम उठाने से बच रहे हैं। ऐसे में अनिवार्य वस्तुओं की महंगाई ने लोगों की चुनौती दोहरी कर दी है।

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From: Jansatta

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