Tuesday, December 7, 2021

मुक्त व्यापार समझौतों की डगर

जयंतीलाल भंडारी

निस्संदेह इस समय मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) भारत के वैश्विक व्यापार को बढ़ाने के लिए महत्त्वपूर्ण जरूरत बन गए हैं। बीते 23 नवंबर को वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत अमेरिका व्यापार नीति मंच के तहत जहां दोनों देशों के बीच महत्त्वपूर्ण व्यापार समझौता हुआ है, वहीं दोनों देशों के बीच सीमित दायरे वाले मुक्त व्यापार समझौते की संभावनाएं बढ़ी है। उनके मुताबिक भारत अमेरिका के अलावा भारत दुनिया के कई देशों- आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और यूरोपीय समुदाय आदि के साथ एफटीए को तेजी से अंजाम देने की डगर पर आगे बढ़ रहा है।

उल्लेखनीय है कि बीते 24 सितंबर को प्रधानमंत्री के अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ वार्ता से भारत के अच्छे आर्थिक और कारोबारी संबंधों की नई संभावनाओं के परिदृश्य में भारत और अमेरिका के बीच सीमित दायरे वाले कारोबारी समझौते की संभावनाएं बढ़ी हैं। जुलाई, 2020 में भारत और अमेरिका के बीच वर्चुअल वार्ता में यह विचार मंथन किया गया था कि दोनों देशों के बीच शुरुआत में सीमित कारोबारी समझौता किया जाए और फिर द्विपक्षीय कारोबार की मदों को चिह्नित करने के साथ एक प्रभावी एफटीए की संभावना को आगे बढ़ाया जाए।

अब मोटे तौर पर भारत और अमेरिका के बीच सीमित दायरे वाले मुक्त व्यापार समझौते के अधिकांश विवादास्पद बिंदुओं का समाधान कर लिया गया है। भारत ने अमेरिका से जनरलाइज्ड सिस्टम आफ प्रिफरेंसेज (जीएसपी) के तहत कुछ निश्चित घरेलू उत्पादों को निर्यात लाभ फिर से देने की शुरुआत करने और कृषि, वाहन, वाहन पुर्जों और इंजीनियरिंग क्षेत्र के अपने उत्पादों के लिए बड़ी बाजार पहुंच देने की मांग की है। दूसरी ओर, अमेरिका भारत से अपने कृषि और विनिर्माण उत्पादों, डेयरी उत्पादों और चिकित्सा उपकरणों के लिए बड़े बाजार की पहुंच, डेटा का स्थानीयकरण और कुछ सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) उत्पादों पर आयात शुल्कों में कटौती चाहता है।

उल्लेखनीय है कि इस समय जिन देशों के साथ सीमित दायरे वाले मुक्त व्यापार की वार्ताएं चल रही हैं, उनमें अमेरिका के साथ एफटीए से भारत के अधिक लाभान्वित होने की संभावना है। इसमें कोई दो मत नहीं कि नए आर्थिक विश्व में द्विपक्षीय व्यापार और कारोबार के लिए अमेरिका और भारत दोनों एक-दूसरे की जरूरत बन गए हैं। अमेरिका भारत के लिए निवेश और तकनीक का महत्त्वपूर्ण स्रोत होने के साथ ही एक महत्त्वपूर्ण कारोबारी साझेदार भी है।

भारत वैश्विक निवेश के आकर्षक केंद्र के तौर पर उभरा है। इसमें भी दो राय नहीं कि इस समय भारतीय बाजार में नवाचार, कारोबार सुधार, उत्पादन और सेवा क्षेत्र में सुधार की जो उभरती प्रवृत्ति रेखांकित हो रही है, वह अमेरिका के उद्योग-कारोबार के लिए अत्यधिक लाभप्रद है। भारत के पास बुनियादी ढांचे और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए घरेलू वित्तीय संसाधनों की भारी कमी है।

पिछले एक दशक के बाद अब भारत द्वारा बड़े एफटीए पर हस्ताक्षर के लिए तैयारी सुकूनदेह है। भारत ने अपना पिछला व्यापार समझौता प्रमुख रूप से 2011 में मलेशिया के साथ किया था। उसके बाद 22 फरवरी, 2021 को मारिशस के साथ सीमित दायरे वाले एफटीए पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते के तहत भारत के कृषि, कपड़ा, इलेक्ट्रानिक्स और विभिन्न क्षेत्रों के तीन सौ से अधिक घरेलू सामानों को मारीशस में रियायती सीमा शुल्क पर बाजार में प्रवेश मिल सकेगा। समझौते के तहत मारीशस की छह सौ पंद्रह तरह की वस्तुओं/ उत्पादों के आयात पर भारत में शुल्क कम या नहीं लगेगा।

दरअसल, हाल के वर्षों में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के तहत विश्व व्यापार वार्ताओं में जितनी उलझनें खड़ी हुई हैं, उतनी ही तेजी से विभिन्न देशों के बीच एफटीए बढ़ते गए हैं। इस समय दुनिया भर में लागू एफटीए की संख्या तीन सौ के पार हो चुकी है। एफटीए ऐसे समझौते हैं, जिनमें दो या दो से ज्यादा देश वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात-निर्यात पर सीमा शुल्क, नियामक कानून, सब्सिडी और कोटा आदि संबंधी प्रावधानों में एक-दूसरे को तरजीह देने पर सहमत होते हैं। ये मुक्त व्यापार समझौते की तरह बाध्यकारी नहीं होते, यानी अगर बाद में किसी खास कारोबारी मुद्दे पर कोई समस्या होती है, तो उसे दूर करने का विकल्प खुला होता है।

हाल ही में प्रधानमंत्री की 30 और 31 अक्तूबर को जी-20 के शिखर सम्मेलन के दौरान जी-20 के विभिन्न राष्ट्र प्रमुखों के साथ की गई प्रभावी बातचीत के बाद सरकार यूरोपीय संघ, आस्ट्रेलिया, यूएई और ब्रिटेन के साथ सीमित दायरे वाले व्यापार समझौते के लिए तेजी से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।

उल्लेखनीय है कि सत्ताईस देशों की आर्थिक और राजनीतिक सहभागिता वाले यूरोपीय संघ के साथ भारत द्वारा 2013 से एफटीए पर कवायद चल रही है। यूरोपीय संघ भारतीय निर्यात का दूसरा सबसे बड़ा गंतव्य है। मगर कई मुद्दों पर मतभेद के कारण यूरोपीय संघ के साथ एफटीए को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका।

मई, 2021 के बाद बदले वैश्विक आर्थिक परिवेश में भारत और यूरोपीय संघ के बीच एफटीए की संभावनाएं बढ़ी हैं। ये ऐसे देश हैं, जिन्हें भारत जैसे बड़े बाजार की जरूरत है और ये देश भारत के विशेष उत्पादों के लिए अपने बाजार के दरवाजे भी खोलने को उत्सुक हैं। इससे घरेलू सामानों की पहुंच एक बहुत बड़े बाजार तक हो सकेगी।

हालांकि आस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ब्रिटेन सहित कुछ और देशों के साथ सीमित दायरे वाले एफटीए के लिए चर्चाएं संतोषजनक रूप में हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी बनी हुई हैं। अब भारत मुक्त व्यापार समझौते से संबंधित अपनी रणनीति में देश की कारोबार जरूरतों और वैश्विक व्यापार परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए जरूरी बदलाव के लिए तैयार है।

दरअसल, भारत की विभिन्न देशों के साथ एफटीए वार्ताओं के लंबा खिंचने का एक बड़ा कारण विनिर्माण जैसे कुछ बेहद गतिशील व्यापार क्षेत्रों में ऊंचे घरेलू शुल्कों का होना है। स्थिति यह है कि भारत अपने एफटीए समझौतों में लगभग सभी व्यापार को अधिक तरजीही शुल्क ढांचे के रूप में प्रस्तुत करने से हिचकता रहा है। लिहाजा, अब एफटीए पर होने वाली वार्ताओं में तरजीही व्यापार उदारीकरण के समकक्ष स्तर और भारत में नियामकीय नीतिगत सुधारों की बात मानी जा रही है।

मगर अब एफटीए का मसौदा बनाते समय यह ध्यान देना होगा कि एफटीए वाले देशों में कठिन प्रतिस्पर्धा के बीच कारोबारी कदम आगे कैसे बढ़ाए जा सकेंगे? विकसित देशों के साथ एफटीए में भारत के वार्ताकारों के द्वारा डेटा संरक्षण नियम, इ-कामर्स, बौद्धिक संपदा तथा पर्यावरण जैसे नई पीढ़ी के कारोबार मसलों को ध्यान में रखा जाना होगा।

एफटीए के समय साझेदार देश से सहयोग और सद्भाव की हर संभव गारंटी लेने से कारोबार की डगर आसान हो सकेगी। हमें एफटीए वाले देशों में कारोबार प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए उत्पादों की कम लागत और अधिक गुणवत्ता की बुनियादी जरूरत के रूप में ध्यान रखना होगा। एफटीए का लाभ उपयुक्त रूप से लेने के लिए जरूरी होगा कि सीमा शुल्क अधिकारियों, संबंधित विशेषज्ञ पेशेवरों और उद्योगपतियों द्वारा समन्वित और संगठित रूप से काम किया जाए।

निश्चित रूप से कोरोना संक्रमण के कारण बदली हुई वैश्विक व्यापार और कारोबार की पृष्ठभूमि में एफटीए को लेकर भारत की रणनीति में बदलाव का स्वागत किया जाना चाहिए। अब भारत दुनिया के विभिन्न देशों के साथ नए सीमित दायरे वाले मुक्त व्यापार समझौतों की डगर पर और तेजी से आगे बढ़ेगा। उम्मीद है कि अब अमेरिका, यूरोपीय संघ, आस्ट्रेलिया, यूएई और ब्रिटेन के साथ सीमित दायरे वाले एफटीए को शीघ्रतापूर्वक अंतिम रूप दिया जा सकेगा और इससे भारत के विदेश-व्यापार के नए अध्याय लिखे जा सकेंगे।

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From: Jansatta

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