Monday, December 6, 2021

नगालैंड हिंसा : कहां तक फैली हैं उग्रवाद की जड़ें

नगालैंड में सुरक्षा बलों द्वारा 14 नागरिकों की हत्या के कारण पूर्वोत्तर में फिर से उग्रवाद के बेकाबू होने की आशंका जताई जाने लगी है। पूर्वोत्तर के इलाकों से सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम,1958 (आफस्पा) को वापस लेने की मांग तो जोर पकड़ने ही लगी है। नागरिक संस्था समूह और अधिकार कार्यकर्ता व क्षेत्र के राज नेता वर्षों से अधिनियम की आड़ में सुरक्षा बलों द्वारा ज्यादती का आरोप लगाते हुए ‘कठोर’ कानून को वापस लेने की मांग करने लगे हैं।

आफस्पा असम, नगालैंड, मणिपुर (इंफाल नगर परिषद क्षेत्र को छोड़कर), अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग, लोंगंडग और तिरप जिलों के साथ असम की सीमा से लगे अरुणाचल प्रदेश के जिलों के आठ पुलिस थाना क्षेत्रों में आने वाले इलाकों में लागू है। हिंसा और आफस्पा हटाने की मांग- पूर्वोत्तर में उग्रवाद का लंबा इतिहास रहा है।

नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, मेघायल और असम के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न जनजातीय समुदाय अपनी कबीलाई और क्षेत्रीय पहचान को लेकर संवेदनशील हैं। जमीन स्तर की हकीकत समझे बगैर कोई कार्रवाई, पूर्वोत्तर में हिंसा का नया अध्याय शुरू हो जाता है। एक दिसंबर 1963 को नगालैंड भारत का 16वां राज्य बना। ये पूर्व में म्यांमार, पश्चिम में असम, उत्तर में अरुणाचल प्रदेश और दक्षिण में मणिपुर से सटा हुआ है। नगालैंड का विवाद काफी पुराना है।

नगालैंड में छात्र संघों के एक छत्र निकाय ‘नार्थ ईस्ट स्टूडेंट्स आर्गनाइजेशन’ (एनईएसओ) ने कहा कि अगर केंद्र पूर्वोत्तर के लोगों के कल्याण और कुशलता के बारे में चिंतित है तो उसे कानून को निरस्त करना चाहिए। एनईएसओ के अध्यक्ष सैमुअल बी जेयरा कहते हैं, ‘सशस्त्र बल पूर्वोत्तर में सजा से मुक्ति के साथ काम कर रहे हैं और उन्हें सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम, 1958 (आफस्पा) के रूप सख्त कानून लागू होने से और बल मिल गया है।’

उनका कहना है कि नगालैंड के मोन की घटना से अतीत की भयानक यादें ताजा हो गईं जब कई मौकों पर सुरक्षा बलों ने उग्रवाद से लड़ने के नाम पर ‘नरसंहार किया, निर्दोष ग्रामीणों को प्रताड़ित किया और महिलाओं से दुष्कर्म किया’।

आल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू) के मुख्य सलाहकार समुज्जल कुमार भट्टाचार्य कहते हैं, ‘सुरक्षा बलों की कार्रवाई अक्षम्य और जघन्य अपराध है।’ ‘मणिपुर वीमेन गन सर्वाइवर्स नेटवर्क’ और ‘ग्लोबल अलायंस ऑफ इंडिजिनस पीपल्स’ की संस्थापक बिनालक्ष्मी नेप्राम कहती हैं कि इस क्षेत्र के नागरिकों और स्थानीय लोगों को मारने में शामिल किसी भी सुरक्षा बल पर कभी आरोप नहीं लगाया गया और न ही गलती के लिए उन्हें सलाखों के पीछे डाला गया। आफस्पा ‘औपनिवेशिक कानून’ है, जो सुरक्षा बलों को ‘हत्या करने का लाइसेंस’ देता है।

नगालैंड के मोन जिले में सेना की गोलीबारी में 14 लोगों की मौत का मामला सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में हंगामा मचा हुआ है। स्थानीय लोग नाराज हैं। इसने अतीत के घाव कुरेद दिए हैं। भारत की आजादी के समय पूर्वोत्तर के कई राज्य भी अलग होने के लिए तैयार थे। तब सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहर लाल नेहरू ने इनको समझाने की कवायद शुरू की।

राज्य गठन और उग्रवाद
इस समझौते के बाद एक दिसंबर 1963 को नगालैंड भारत का 16वां राज्य बन गया। लेकिन उग्रवादी गतिविधियों पर रोक नहीं लग पाई। 1975 में कई उग्रवादी नेताओं ने हथियार डाला लेकिन ये भी काफी नहीं रहा। 1980 में कुछ उग्रवादियों ने मिलकर नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आफ नागालैंड (एनएससीएन) का गठन कर दिया। मोन जिले में जिन उग्रवादियों पर कारर्वाई के लिए सुरक्षाबलों ने घेरेबंदी की थी, वो इसी संगठन से जुड़े हैं।

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From: Jansatta

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