नगालैंड में सेना की गोलीबारी से चौदह लोगों की मौत पूर्वोत्तर की पहली घटना नहीं है। क्या यह अंतिम होगी? इसका उत्तर न तो प्रशासन के पास है, न गृह मंत्रालय के पास। देश की सुरक्षा में लगी सेनाओं के इस जघन्य हत्याकांड के बाद राज्य और केंद्र सरकार क्या कर रही है? मामले पर लीपापोती की जा रही है।
केंद्रीय गृहमंत्री और मुख्यमंत्री नेफिउ रियो मामले की जांच करा कर दोषियों को सजा देने की बात कह रहे हैं। मृतकों के परिवारों को न्याय दिलाने की बात की जा रही है। क्या सेना को सजा दी जा सकेगी? कभी नहीं। यह असंभव है। नगा लोगों को गुमराह किया जा रहा है। नगालैंड में इस समय सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम लागू है, जिसके चलते सेना को सात खून माफ है।
देश की सेना हो या पुलिस बल। एक देश की सीमाओं की रक्षा करती है, तो दूसरी कानून-व्यवस्था बनाए रखने का काम करती है। फिर भी इन दोनों ने कभी आम लोगों के दिलों को नहीं जीता है। आमजन कभी इन्हें अपना नहीं मानते। क्यों नहीं मानते, इसका उदहारण हमें रविवार को नगालैंड के मोन जिले में देखने को मिल गया।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर
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