जमीनी स्तर पर चरमपंथ के खिलाफ किसी संवेदनशील अभियान में लगे सेना के जवानों या सुरक्षा बलों और उनके अधिकारियों का कोई एक गलत फैसला, लापरवाही या फिर अधिकारों के बेलगाम इस्तेमाल का नतीजा क्या हो सकता है, इससे किस तरह समूचा सत्ता-तंत्र कठघरे में खड़ा हो सकता है, यह नगालैंड की ताजा घटना से फिर साबित हुआ है। वहां मोन जिले के ओटिंग गांव में कथित तौर पर उग्रवादियों की गतिविधियों की खुफिया सूचना के बाद सेना के गश्ती दल ने एक वाहन दिखते ही उस पर गोलीबारी शुरू कर दी।
इसमें छह लोगों की जान चली गई। जबकि वाहन में सवार लोग एक कोयला खदान में दिहाड़ी मजदूर थे और काम से अपने घर लौट रहे थे। अचानक और सीधे गोलीबारी करने के लिए क्या सिर्फ इस तरह की कोई सूचना काफी है कि कहीं कोई संदिग्ध गतिविधि चल रही है? सैनिकों की लापरवाही और गैरजिम्मेदारी यहीं नहीं रुकी। जब स्थानीय ग्रामीणों का इस घटना पर गुस्सा फूटा, तब बचाव के तर्क पर फिर से उन्होंने गोलीबारी की और उसमें और आठ लोग मारे गए।
किसी जटिल समस्या के समाधान के अभियान में इतनी अहम जिम्मेदारी निभाने वालों के सामने क्या हालात को संभालने के सभी विकल्प खत्म हो गए थे? नगालैंड पुलिस ने इस घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए जिम्मेदार जवानों के खिलाफ अनेक धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है, जिसमें हत्या से संबंधित धारा भी शामिल है। सवाल है कि जिन लोगों को किसी इलाके में शांति स्थापित करने के मकसद से तैनात किया गया हो, अगर उनकी ही लापरवाही से समस्या और गंभीर हो जाए, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा?
अब चौदह ग्रामीणों के मारे जाने की त्रासद घटना के बाद संबंधित अधिकारियों से लेकर केंद्र सरकार तक के लिए इस पर सफाई देना मुश्किल हो गया है। एक ओर सेना ने कोर्ट आफ इन्क्वायरी बिठाई है, तो केंद्रीय गृहमंत्री को संसद में कहना पड़ा कि सेना ने नागरिकों की पहचान में गलती की। स्वाभाविक ही नगालैंड में नागरिक संगठनों से लेकर सभी राजनीतिक पक्षों ने इस घटना पर क्षोभ जताया और खुद नगालैंड के अलावा मेघालय के मुख्यमंत्री ने भी सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम यानी अफस्पा हटाने की मांग की है।
नगालैंड को उग्रवाद का हवाला देकर अशांत क्षेत्र घोषित किया गया है। सरकार ऐसे इलाकों में आमतौर पर अफस्पा लागू कर देती है। लेकिन सैन्य बलों की ओर से इस कानून के दुरुपयोग को लेकर लंबे समय से आवाजें उठती रही हैं। ऐसे आरोप सामने आते रहे हैं कि इस कानून को स्थानीय स्तर पर आम नागरिकों के दमन का हथियार बनाया गया है। ताजा घटना में भी एक पक्ष यह हो सकता है कि नगालैंड में लागू अफस्पा के चलते सैन्य बलों ने बिना किसी पुष्टि के गोलीबारी की।
इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि शांति कायम करने के नाम पर जिस कानून को एक अचूक उपाय के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, वही दमन-उत्पीड़न का हथियार बन जाए। सत्ता-तंत्र के किसी हिस्से के हाथ में अधिकार का हासिल शांति होना चाहिए या अशांत इलाके की समस्या को और जटिल बनाना? आखिर किसी इलाके के नागरिकों के भीतर क्षोभ पैदा होने के क्या कारण होते हैं? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि पूर्वोत्तर के राज्य पहले ही राजनीतिक और भौगोलिक तौर पर संवेदनशील इलाके के तौर पर देखे जाते हैं। इस लिहाज से उन इलाकों में चलने वाले सैन्य अभियान भी दूरगामी नजरिए से चलने चाहिए।
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From: Jansatta
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