Saturday, November 20, 2021

मुखर और प्रतिबद्ध विचारक यूआर अनंतमूर्ति

लेखक और विचारक की मौलिक शिनाख्त को एक शाश्वत विद्रोही के तौर पर देखा गया है। अभिव्यक्ति और आजादी की साझी दरकार इसी शिनाख्त को सुरक्षित करने के लिए है। एक ऐसे दौर में जब कलम और समझौते की दूरी एक मजबूत पर खतरनाक साझे के तौर पर उभर रही है, वैसे में हम जिन भारतीय लेखकों के पास जाकर अपनी निराशा दूर कर सकते हैं, यूआर अनंतमूर्ति का नाम उनमें काफी ऊपर है। ऐसा इसलिए नहीं कि उनके लेखन की सार्वकालिकता का विस्तार आपवादिक रूप से बड़ा है बल्कि इसलिए कि वे समकालीनता के सवालों से सबसे ज्यादा जूझते हैं, उनके बीच मनुष्य और संवेदना के लिए रास्ता खोजने-बताने का रचनात्मक बीड़ा उठाते हैं।

अलबत्ता अपनी मुखर और ठोस प्रतिबद्धता के कारण अनंतमूर्ति कई अर्थों में विवादित भी रहे। कहा तो यहां तक गया कि भारतीय राजनीति के बदले स्वभाव और तेवर को लेकर वे कुछ ज्यादा ही प्रतिक्रियावादी हैं। मुमकिन है कि उनका यह रुझान उनकी समझ की सीमा भी रही हो, पर इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि वैचारिक प्रतिबद्धता को जितनी दूर तक सधा होना चाहिए, अनंतमूर्ति उतनी दूर तक की यात्रा के लिए हमेशा जाागरूक और तत्पर दिखते हैं।

कन्नड़ के इस यशस्वी साहित्यकार का जन्म कर्नाटक के शिमोग जिले के तीर्थहल्ली नगर में 1932 में हुआ। मैसूर विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने 1956 में वहीं पर अंग्रेजी विभाग में अध्यापन कार्य शुरू किया। इसके बाद उन्होंने बर्मिंघम यूनिवर्सिटी (यूके) से पीएचडी की उपाधि पाई और अध्यापन के लिए कई विश्वविद्यालयों से जुड़े। वे महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, कोट्टायम के उपकुलपति और राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष भी रहे। उनकी 20 से अधिक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें ‘भव’, ‘संस्कार’, ‘भारतीपुर’ और ‘अवस्थे’ शीर्षक उपन्यासों के अलावा पांच आलोचनात्मक किताबें भी हैं।

अनंतमूर्ति ने हिंदू समाज में जाति की केंद्रीयता को नए सिरे से रेखांकित किया। जब 1965 में वे अपने उपन्यास ‘संस्कार’ के साथ कन्नड़ के साहित्य क्षितिज पर प्रकट हुए, तो एक धमाका सा हुआ। लेखक स्वयं ब्राह्मण था पर ब्राह्मण समाज के पाखंड को बड़ी तल्खी के साथ उजागर कर रहा था। यह साहित्यिक से आगे एक बड़ी सामाजिक घटना थी।

उनकी इस रचनात्मक पहल का ही नतीजा था कि कन्नड़ साहित्य में ‘नव्या’ आंदोलन शुरू हुआ, जिसने कन्नड़ लेखकों के दो वर्ग बना दिए। एक वर्ग भैरप्पा जैसे परंपरावादी लेखकों का जो बड़ा सामाजिक चित्र प्रस्तुत करते हुए भी भारतीय समाज में उभर रहे अंतर्द्वंद्वों का साक्षी नहीं बनना चाहता था, तो दूसरा अनंतमूर्ति जैसे लेखकों का जो नए और प्रगतिशील मूल्यों के साथ खड़ा था।

वे अपने लेखन से न सिर्फ भारत बल्कि विश्व साहित्य में भी चर्चा में रहे। उनकी कई कृतियां भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी, जर्मन और बुलगेरियन आदि विश्व की प्रमुख भाषाओं में भी अनूदित हो चुकी हैं। 1970 में उनकी कृति ‘संस्कार’ पर आधारित कन्नड़ फिल्म को सर्वश्रेष्ठ भारतीय फीचर फिल्म का पुरस्कार मिला।

साहित्यिक योगदानों के लिए उन्हें 1998 में भारत सरकार ने ‘पद्मभूषण’ से नवाजा। भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित अनंतमूर्ति इस मायने में भी विशिष्ट रहे कि अंग्रेजी के अपने दखल और विद्वता को उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति पर हावी नहीं होने दिया और लगातार कन्नड़ में ही लिखते रहे। देसी मन और भाषा के साथ उन्होंने विचार और साहित्य की दुनिया को जितनी दूर तक प्रभावित किया, वह एक मिसाल है।

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From: Jansatta

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